राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।
अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहिं श्रीरघुराई ।।
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Sunday, August 2, 2026

सुन्दरकाण्ड-२७-हनुमानजी की पूँछ में राक्षसों द्वारा आग लगाया जाना

 

रावण ने कहा जब यह बानर बिना पूँछ के अपने स्वामी के पास जाएगा तब यह मूर्ख अपने स्वामी को लेकर यहाँ आएगा । जिनकी इसने बहुत बड़ाई किया हैं, मैं भी उनकी प्रभुता देखूँ । रावण के बचनों को सुनकर हनुमान जी मन ही मन मुस्कराने लगे । अर्थात आनंदित हुए । शंकरजी कहते हैं कि रावण के ऐसे बचनों को सुनकर मैं जान गया कि सरस्वतीजी सहायक हुई हैं । अर्थात सरस्वतीजी ने रावण की जिह्वा पर बैठकर उससे पूँछ में आग लगाने को कहलवा दिया है ।

                       

  राक्षस रावण के बचनों को सुनकर तेल, कपड़ा आदि इकट्ठा करने में लग गए । हनुमानजी ने लीला किया जिससे उनकी पूँछ बढ़ गई और लंका में कपड़ा, तेल और घी सब समाप्त हो गए । यह तमाशा देखने के लिए लंका नगर निवासी इकट्ठा हो गए और वे हनुमानजी को अपने पैरों से मारकर बहुत हँसी करने लगे ।

 

ढोल बज रहे थे । सभी लोग ताली बजा रहे थे । लंका में हनुमानजी को घुमाकर राक्षसों ने उनकी पूँछ में आग लगा दिया ।

 

।। जय श्रीसीताराम ।।

 

 

 

 

Sunday, July 5, 2026

सुंदरकाण्ड-२६-हनुमानजी की पूँछ में आग लगाने को रावण का राक्षसों को आदेश देना


 

  हनुमानजी महाराज ने कहा कि हे रावण सुनों मैं प्रतिज्ञा करके अर्थात सर्वथा सत्य कह रहा हूँ कि रामविमुख की रक्षा करने वाला रामजी के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है । एक नहीं हजारों शंकरजी, विष्णुजी और व्रह्मा जी भी रामविमुख की रक्षा नहीं कर सकते ।

तुम बहुत ही पीड़ा देने वाले मोह के मूल अभिमान को छोड़कर करुणा के सागर रघुकुल श्रेष्ठ भगवान श्रीराम का भजन करो ।

यद्यपि हनुमानजी महाराज ने रावण से भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से युक्त बहुत ही हितकर बात कही फिर भी महाभिमानी रावण ने हँसते हुए कहा कि हमें बहुत बड़ा ज्ञानी गुरु यह बानर मिला है ।

फिर रावण ने हुनमान जी से कहा कि हे दुष्ट तेरी मृत्यु निकट आ गई है । नीच तूँ मुझे ज्ञान सिखला रहा है । हनुमानजी महाराज ने कहा कि तुम्हे मति भ्रम हो गया यह मैं प्रगट रूप में जान गया हूँ क्योंकि जो तुम कह रहे हो ठीक उसका उल्टा होने वाला है ।

 

हनुमानजी के बचनों को सुनकर रावण बहुत खिसिया गया और बोला कि इस मूर्ख के प्राण जल्दी ही ले क्यों नहीं लेते । यह सुनकर राक्षस हनुमानजी को मारने दौड़े । इसी समय अपने मंत्रियों के साथ विभीषण जी आ गए ।

 

विभीषण जी ने सिर झुकाकर रावण से बहुत विनती किया और बोले दूत का बध नीति के विरुद्ध है इसलिए इस वानर का बध न किया जाय । आप इसे कोई दूसरा दंड दे सकते हैं । यह सुनकर अन्य लोगों ने भी कहा कि बहुत ही सुंदर बिचार हैं ।

अर्थात इस बानर का बध उचित नहीं है इसे कोई दूसरा दंड देना चाहिए । यह सुनकर रावण हँसते हुए बोला कि इस बंदर का अंग-भंग करके भेज दो । रावण ने आगे सभी को समझाते हुए कहा कि बानर को उसकी पूछ बहुत प्रिय होती है । इसलिए कपड़ा तेल में डुबोकर इसकी पूँछ में बाँध करके आग लगा दो ।

 

 

।। जय श्रीसीताराम ।।

Saturday, May 2, 2026

सुंदरकाण्ड-२४- हनुमान जी का रामजी के शरण में जाने के लिए रावण को समझाना

 

हनुमानजी महाराज ने रावण से कहा कि हे रावण मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती कर रहा हूँ कि तुम अभिमान को छोड़कर मेरी सीख को सुन लो । तुम बिचार करके अपने कुल को देखो और भ्रम को छोड़कर भक्तों के भय को हरने वाले भगवान श्रीराम का भजन करो । रावण का कुल बहुत ही उत्तम था । इसके कुल में सब भगवान का भजन करने वाले थे । इसलिए हनुमान जी ने कहा कि तुम भी अपनी कुल परंपरा के अनुसार भगवान का भजन करो ।

 

हनुमानजी ने कहा कि काल देवता, राक्षस और चर-अचर सबको खा जाता है । अर्थात कोई और कुछ भी ऐसा नहीं है जो काल का ग्रास न बनता हो । लेकिन यह काल भी जिसके डर से बहुत डरता है उन भगवान श्रीराम से किसी भी स्थिति में बैर मत करो । और मेरे कहने से जनकसुता सीताजी को वापस कर दो ।

 

देवताओं की आयु बहुत अधिक होती है । इसलिए ही उन्हें अमर कहा जाता है । लेकिन वस्तुतः वे अमर नहीं हैं । इस संसार में कोई भी अविनाशी नहीं है । एक न एक दिन सबका विनाश होता है । केवल और केवल एकमात्र भगवान ही अविनाशी हैं । इस प्रकार काल सबको खा जाता है-

राजा रंक मुरख निपुन ऋषि महर्षि सब देव ।

रामदास मरने चले बचा नहि जग केव ।।

 

हनुमानजी ने रावण से कहा कि करुणा के सागर खरारि भगवान श्रीराम शरण में आए हुए का पालन करने वाले हैं । अर्थात जो कोई भी उनकी शरण में जाता है उसे वे ठुकुराते नहीं हैं । अपना लेते हैं और उसका हर तरह से पालन करते हैं । इसलिय तुम भी भगवान श्रीराम के शरण में चले जाओ । शरण में जाने से तुम्हारे सारे अपराधों को छमा करके तुम्हें अपना लेंगे । अपनी शरण में रख लेंगे ।

 

   रामजी शरण में आए हुए जन का अपराध नहीं देखते हैं । उसके सारे अपराध को छमा करके निर्भय कर देते हैं और रख लेते हैं । इतना ही नहीं सदा-सदा के लिए रख लेते हैं । जिसको एक बार अपना कह दिया । उसे कभी नहीं छोड़ते । किसी भी स्थिति और परिस्थिति में नहीं छोड़ते । यह भगवान श्रीराम का वाना-स्वभाव है ।


। जय श्रीराम 

 । जय श्रीहनुमान 

 

 

 

Thursday, April 2, 2026

सुन्दरकाण्ड-23 -हनुमान जी का रावण के अन्य प्रश्नों का उत्तर देना

 हनुमानजी महाराज से रावण ने कहा था कि क्या तुमने अपने कानों से हमारे बारे में नहीं सुना  है ? अर्थात रावण अपनी प्रभुता के बारे में पूछ रहा था कि क्या तुम्हें मेरी प्रभुता के बारे में  पता नहीं है ?

  हनुमानजी महाराज ने कहा कि हे रावण मैं तुम्हारी प्रभुता जानता हूँ । तुम्हारी सहसबाहु से लड़ाई हुई थी । इस लड़ाई में रावण की हार हुई थी । सहसबाहु ने रावण को ऐसे पकड़कर दबोच लिया था जैसे किसीने किसी छोटे प्राणी को सहज ही दबोच लिया हो । हनुमानजी महाराज ने आगे कहा कि बालि से युद्ध करके तुम्हें बहुत यश मिला था । रावण ने बालि से हारने के बाद संधि कर लिया था । हनुमानजी के ऐसे बचनों को सुनकर रावण ने हँसकर अनसुना कर दिया ।

 

हनुमानजी महाराज ने आगे कहा कि मुझे भूँख लगी थी इसलिए मैंने फल खा लिया । हनुमानजी ने कहा कि बंदर के सहज स्वभाव से मैंने वृक्षों को तोड़ा है । अर्थात मैंने जान-बूझ कर ऐसा नहीं किया है यह तो बानरों का सहज स्वभाव है ।

 

रावण ने पूछा था कि तुमने राक्षसों को क्यों मारा ? इसके जबाब में हनुमानजी ने कहा कि सबको देंह प्रिय होती है । लेकिन मुझे मेरे स्वामी परम प्रिय है । और मेरे स्वामी रामजी अपना घर बनाकर मेरी देंह-ह्रदय में रहते हैं । और दुष्ट राक्षस मुझे मार रहे थे-मेरी देंह पर प्रहार कर रहे थे । इसलिए जिसने मुझको मारा मैंने उसे मार डाला । इसपर तुम्हारे पुत्र ने मुझे बाँध लिया । लेकिन मुझे बाँधे जाने पर कोई लज्जा नहीं है । मैं तो अपने स्वामी भगवान राम का कार्य पूरा करना चाहता हूँ ।

  अर्थात भगवान के किसी भी कार्य के लिए लज्जा की कोई बात नहीं होती । जो करना पड़े करना चाहिए यदि  भगवान का कार्य होता हो । इसीप्रकार भजन में भी लज्जा की कोई बात नहीं होती । जैसे भजन बने भजन करना चाहिए । जो भगवान से जोड़े वह जुड़ने योग्य-करने योग्य होता है । जिसमें भगवान की प्रसन्नता हो उसे करना ही चाहिए ।

 

                                              

।। जय श्रीसीताराम ।।

Monday, March 2, 2026

सुंदरकाण्ड भाग-२२- हनुमानजी का रावण के प्रश्नों का उत्तर देना- राम जी की महिमा का वर्णन

 हनुमानजी को देखकर रावण दुर्वचन कहकर जोर से हँसा ।  फिर अपने पुत्र अक्ष कुमार के बध की बात स्मरण में आते ही उसके ह्रदय में दुःख उत्पन्न हुआ । रावण ने हनुमानजी से कहा कि हे बंदर तुम कौन हो ? और किसके बल से वन को उजाड़कर नष्ट कर डाला है । मूर्ख तूँ बहुत निडर दिखलाई पड़ रहा है । लगता है तुमने अपने कानों से मेरे बारे में सुना नहीं है । तुमने किस अपराध से राक्षसों का बध किया है । हे मूर्ख बता कि क्या तुझे अपने प्राणों का भय नहीं है ।

  हनुमानजी महाराज ने कहा कि हे रावण सुनों जिनका बल पाकर माया समस्त व्रह्मान्डों की रचना करती है ।

 हे रावण जिनके  बल से  व्रह्मा जी सृष्टि की रचना, विष्णुजी सृष्टि का पालन और शंकर जी सृष्टि का संहार करते हैं । जिनके बल से सहस्त्र मुख वाले शेष जी वन, पर्वत सहित समस्त व्रह्मान्डों को अपने सिर पर धारण करते हैं ।

हनुमान जी ने आगे कहा कि जो तुम जैसे मूर्खों को शिक्षा देने के लिए और देवताओं की रक्षा करने के लिए नाना शरीर (अवतार) धारण करते हैं ।

                    

जिन्होंने भगवान शंकर के कठोर धनुष को तोड़कर उसके साथ राजाओं के दल का मद चूर्ण कर दिया है । और जिन्होंने खर, दूषण, त्रिसरा अरु बालि, जो सबके सब बहुत ही बलशाली थे, का बध कर दिया है । जिनके लेशमात्र बल से तुमने सम्पूर्ण चराचर जगत को जीति लिया है मैं उन्ही भगवान राम का दूत हूँ जिनकी प्रिय पत्नी को तुम हरण करके ले आये हो ।

 

 इस प्रकार हनुमान जी महाराज ने रावण की सभा में रावण द्वारा पूछे गए पहले प्रश्न का इतना बड़ा उत्तर दिया ।

पहला प्रश्न यही था कि हे वानर तुम कौन हो और किसके बल से हमारी वाटिका को तहस-नहस कर दिया है ।

 

  हनुमानजी महाराज ने बताया कि इस समस्त संसार में एक मात्र मेरे प्रभु राम का ही बल है । जो बल व्रह्मा, शिव और नारायण में है वह भी मेरे स्वामी का ही है । शेष नाग में भी मेरे स्वामी का ही बल है । सबमें मेरे स्वामी का ही बल है । यहाँ तक जो लेशमात्र बल तुममें है वह भी मेरे स्वामी का है । अर्थात तुम पूछ रहे हो कि किसके बल से मैंने तुम्हारी वाटिका को उजाड़ा है । तो सुनों जिसके बल से सब में कुछ करने की शक्ति आती है मैं उन्हीं भगवान राम का दूत हूँ जिनकी प्रिय पत्नी का तुमने धोखे से हरण कर लिया है ।

 

                                 ।। जय श्रीसीताराम ।।

Saturday, February 21, 2026

सुन्दरकाण्ड-२१- हनुमानजी का मेघनाद से युद्ध और बंदी बनकर रावण की सभा में प्रवेश

 अपने पुत्र का वध सुनकर रावण क्रोधित हो उठा । और उसने बलवान मेघनाद को भेजा । रावण ने कहा कि हे पुत्र उसे मारना नहीं । बाँध लाना । देखा जाय वह बंदर कहाँ से आया है  । अर्थात उसके बारे में जाना जाय कि वह कहाँ का है । और क्यों आया है । या उसे किसी ने भेजा है । इंद्र को युद्ध में जीतने वाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला और उसे भाई का वध सुनकर क्रोध हो आया ।

 

  हनुमानजी महाराज ने देखा कि इस बार भयानक योद्धा आया है । तो वे कटकटाकर गर्जे और दौड़े । हनुमान जी ने एक बहुत ही विशाल वृक्ष को उखाड़ लिया । और उसे मेघनाद के रथ पर फेका । मेघनाद का रथ टूट गया । इस प्रकार मेघनाद रथ से बिहीन हो गया । मेघनाद के साथ बड़े-बड़े योद्धा थे । हनुमानजी उन्हें पकड़-पकड़कर अपने शरीर से ही रगड़ना शुरू कर दिया । योद्धाओं को मारकर हनुमानजी मेघनाद से लड़ने लगे । ऐसा लग रहा था कि कोई दो गजराज लड़ रहे हों ।

 

  हनुमानजी ने मेघनाद के ऊपर मुष्टिक का प्रहार करके पेड़ पर चढ़ गए और उसे एक क्षण के लिए मूर्छा आ गई । मूर्छा दूर होने पर मेघनाद ने फिर से बहुत सारी माया दिखाई । लेकिन पवनसुत हनुमानजी उससे जीते नहीं जा रहे थे । अर्थात वह असफल ही हो रहा था । तब उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया । हनुमानजी ने बिचार किया कि इस अस्त्र की अपार महिमा है । यदि मैं इसके वार को नहीं सहूँगा तो इस अस्त्र का निरादर हो जायेगा । इसकी महिमा मिट जायेगी । यह सोचकर हनुमानजी ने उसका वार सह लिया । ब्रह्मास्त्र के लगने पर हनुमानजी मूर्छित होकर गिर गए । और गिरते हुए भी उन्होंने मेघनाद की सेना का संहार किया ।

 

  मेघनाद ने देखा कि हनुमानजी मूर्छित हो गए हैं तब उसने नागपाश से हनुमानजी को बाँधकरले गया ।

  शंकरजी पार्वती माता से कहते हैं कि हे भवानी जिनका नाम जप करके ज्ञानी लोग जन संसार रुपी बंधन को काट कर मुक्त हो जाते हैं । ऐसे भगवान राम के दूत हनुमानजी कहीं बंधन में आ सकते हैं क्या ? अर्थात हनुमानजी को कोई बाँध नहीं सकता । हनुमानजी ने रामजी का कार्य पूरा करने के लिए स्वयं को जान बूझकर बँधा लिया है ।

 

जब राक्षसों ने सुना कि जो बंदर अशोक वाटिका में फल खा रहा था बंदी बना लिया गया है तब वे लोग तमाशा देखने के लिए रावण की सभा में आ गए । हनुमानजी ने रावण की सभा को जाकर देखा । उसकी इतनी प्रभुता थी जिसका कोई वर्णन नहीं हो सकता ।  देवता और दिग्पाल हाथ जोड़कर बहुत ही विनीत भाव से खड़े हुए थे । सभी लोग डरे हुए रावण की भृकुटी की तरफ देख रहे थे । अर्थात कब किसकी ओर रावण भृकुटी टेढ़ी कर दे कोई पता नहीं था । इस प्रकार सब डरे हुए रावण का रुख देख रहे थे ।

 

   रावण का इतना प्रताप देखकर भी हनुमानजी के मन में कोई शंका नहीं हुई । अर्थात कोई भय नहीं हुआ । वे उसकी सभा में इस प्रकार पहुँचे और इस प्रकार खड़े हुए थे जैसे सांपों के झुण्ड में गरुड़जी निडर रहते हैं । अर्थात जिस प्रकार गरुड़ जी को देखकर सांपों को भय होता है । सांप डर जाते हैं । उसी प्रकार हनुमानजी को देखकर उल्टे राक्षसों को भय हुआ । 

                       

।। जय श्रीसीताराम ।।

Tuesday, February 10, 2026

सुन्दरकाण्ड-२०-सीताजी से आज्ञा लेकर हनुमानजी का वाटिका में प्रवेश और राक्षसों से युद्ध तथा अक्ष कुमार का वध

 सीताजी से आशिर्बाद पाकर हनुमानजी महाराज ने सीताजी से कहा कि हे माता ! सुनिए- मुझे सुंदर फल से युक्त वृक्षों को देखकर बड़ी भूँख लग गई है । जैसे छोटे बच्चे को खाने-पीने वाली चीज देखकर भूँख लग जाती है और वह अपनी माता से माँगने लग जाता है । ठीक इसी भाव से हनुमान जी को सुंदर-सुंदर फल देखकर भूँख लग गई और उन्होंने माता सीता से निवेदन भी कर दिया ।

 

  माता सीता ने कहा कि हे बेटा ! सुनो इस वन की रखवाली बड़े-बड़े भारी योद्धा राक्षस करते हैं । अर्थात रावण ने इस वाटिका की रक्षा के लिए बड़े-बड़े योद्धाओं को लगा रखा है । हनुमान जी ने कहा के माता यदि आप मन में प्रसन्न होकर आज्ञा दें तो मुझे योद्धाओं का भय नहीं है ।

 

सीता जी ने देखा कि हनुमान जी बल और बुद्धि में निपुण हैं इसलिए कहा कि जाओ और रामजी के चरणों को हृदय में धरकर मधुर फल खाओ । अर्थात राम जी को भोग लगाकर, राम जी को निवेदित करके मधुर-मधुर फल खाइए । 

 

हनुमानजी ने माता सीता के चरणों में शिर नवाकर अर्थात प्रणाम करके वाटिका में प्रवेश किया । और फल खाकर पेड़ों को तोड़ने लगे । वाटिका की रखवारी में बहुत से योद्धा थे । कुछ योद्धाओं को हनुमानजी ने मार दिया और कुछ रावण के पास जाकर पुकारने लगे ।

 

राक्षस योद्धा रावण से बोले कि हे स्वामी ! एक बहुत बड़ा वानर आया है जिसने अशोक वाटिका को उजाड़ दिया है । उसने फल खाएँ हैं और वृक्षों को उखाड़ दिया है । तथा रक्षकों को मसल-मसलकर पृथ्वी पर गिरा दिया है । ऐसा सुनकर रावण ने बहुत सारे योद्धाओं को भेजा । जिन्हें देखकर हनुमानजी महाराज ने गर्जना की । हनुमान जी ने सभी राक्षसों का संहार कर दिया । कुछ अधमरे राक्षस चिल्लाते हुए रावण के पास गए ।

 

फिर रावण ने अपने बेटे अच्छकुमार को भेजा । वह अपने साथ अनेकों श्रेष्ठ योद्धाओं को लेकर चला । उसे आता हुआ देखकर हनुमान जी ने एक वृक्ष को पकड़कर-हाथ में लेकर उसे ललकारा और उसे सहज ही मारकर बड़े जोर से गर्जना की ।

 

अक्ष कुमार के साथ जो योद्धा आए थे उनमें से कुछ को मार डाला, कुछ को मसल डाला और कुछ को पकड़कर धूल में मिला दिया-गाड़ दिया । और कुछ फिर जाकर रावण से बोले कि हे स्वामी वह मर्कट बड़ा ही बलवान है । 

 

                                                      

।। जय श्रीसीताराम ।।

Saturday, January 10, 2026

श्रीसुन्दरकाण्ड भाग -१७ -सीताजी से राम वियोग का वर्णन और रामजी की प्रभुता को याद दिलाकर सीताजी को धैर्य धारण कराना

 

हनुमानजी महाराज के हृदय में स्थिति राम जी बोले कि हे सीते ! मुझको सबकुछ उल्टा लगने लगा है । वृक्षों की नए-नए कोपलें अग्नि के समान लग रहे हैं । रात्रि कालरात्रि के समान और चंद्रमा सूर्य के समान प्रतीत हो रहा है । 

कमल के वन काँटों के वन की तरह लग रहे हैं ।  और वारिश ऐसे लगती है मानों बादल जल के स्थान पर गर्म-गर्म तेल की वर्षा कर रहे हों ।  जो-जो वस्तुएँ पहले हितकारी लगती थीं वे ही अब कष्टकारी लग रही हैं । शीतल,मंद और सुगंधित जो त्रिविधि वायु है वो साँप के स्वास के समान गर्म और जहरीली प्रतीत हो रही है ।

 

कहने से दुख थोड़ा कम हो जाता है । लेकिन किससे कहूँ कोई भी इस दुख को जानने वाला नहीं है । राम जी ने कहा कि मेरे और तुम्हारे प्रेम का जो सार यह है कि हे प्रिय तुम जानती हो कि मेरे एक ही मन है । और वह मन सदा आपके ही पास रहता है । इतने में ही अथवा इससे ही आप मेरी प्रीति के सार को जान लीजिए, समझ लीजिए । राम जी का ऐसा संदेश सुनकर सीता जी राम जी के प्रेम में मग्न हो गईं, खो गईं और उन्हें शरीर की कोई सुधि नहीं रही ।

 

तब हनुमानजी महाराज बोले कि हे माता आप हृदय में धैर्य धारण कीजिए और अपने भक्तों-सेवकों को सुख देने वाले भगवान श्रीराम को याद कीजिए । उनका सुमिरण कीजिए । आप अपने हृदय में राम जी की प्रभुता को लाइए । सोचिये, बैठाइए और मेरे बचनों को सुनकर कायरता को छोड़ दीजिए ।

 

भक्त अथवा भगवान के सेवक जब भगवान की प्रभुता को भुला देते हैं । अथवा परिस्थिति की विषमता देखकर अथवा दुख की भीषणता देखकर भगवान की प्रभुता विस्मृति हो जाती है तो अधीरता बढ़ती है । इससे दुख बढ़ता है । अथवा यूँ कहें कि यही दुख का कारण बनता है । अन्यथा यदि जीव को भगवान के गुण, उनकी दयालुता, सर्वव्यापकता, समर्थता, प्रभुता  आदि पर दृढ़ विश्वास रहे, सतत स्मरण रहे तो फिर दुख कहाँ ?

 

  लेकिन जब सीता जी को भगवान की प्रभुता विस्मृति हो सकती है तो साधारण जीव इससे कहाँ बच सकते हैं ।

 

हनुमान जी महाराज ने कहा कि राक्षस पतिंगे के समान और भगवान श्रीराम के वाण अग्नि के समान हैं । अतः हे माता आप इन्हें जला हुआ ही समझिए और हृदय में धैर्य धारण कीजिए ।

 

जैसे पतिंगे आग्नि के पास जाते ही समाप्त हो जाते हैं वैसे ही बस राम जी के आने की देरी है और राक्षस समाप्त । उनके अग्नि रुपी वाण की ओर राक्षस रुपी पतिंगे सहज ही खिचें चले आएँगे और स्वयं जलकर प्राणांत कर लेंगे । रामजी को कुछ करने की जरूरत नहीं है । बस यहाँ आना है और राक्षसों को उनके वाण का दर्शन होते ही सब जल मरेंगे ।

 

अतः हे माता आप अपने हृदय में धैर्य धारण कीजिए । और राम जी के सेवक सुख दायक वाने का सुमिरण कीजिए । यह सब सोचना छोड़ दीजिए कि राम जी कैसे आयँगे ? और इन पराक्रमी राक्षसों को कैसे मारेंगे ? क्योंकि ये पतिंगे हैं और इन्हें आप जला हुआ ही समझों ।

                                                            

।। जय श्रीसीताराम ।।

 

 

Thursday, December 4, 2025

श्रीसुंदरकाण्ड भाग-१६- सीताजी का हनुमानजी से रामजी और लक्ष्मणजी का कुशल समाचर पूछना

 

जब सीताजी ने जान लिया कि हनुमानजी राम जी के जन यानी भक्त हैं तो हनुमान जी पर सीताजी की गाढ़ी प्रीति हो गई । जब दो सच्चे भक्त मिलते हैं तो दोंनो के बीच ऐसी ही प्रीति हो जाती है । सीताजी के नयन सजल हो गए । और शरीर पुलकित हो गया । जब भक्त आपस में मिलते हैं तो भगवान की चर्चा करते हैं । भगवान के बारे में ही प्रश्न करते और बातचीत करते हैं ।

 

 

 सीता जी ने कहा कि हे हनुमान मैं विरह रुपी सागर में डूब रही थी । लेकिन आप मुझे बचाने के लिए जहाज बनकर आ गए हो । जब भक्त भगवान के विरह में डूब रहा हो तो उसे सत्संग मिल जाय, भगवान की चर्चा करने और सुनने का अवसर मिल जाय तो यही उसके लिए अवलंबन का काम करता है । सीताजी ने कहा कि मैं बलिहारी जा रही हूँ अब लक्ष्मण जी के सहित सुख के भवन राम जी का कुशल समाचार सुनाओ ।

 

 

  राम जी का ह्रदय बहुत ही कोमल है । वे सहज ही कृपा करने वाले हैं । इसके बावजूद भी हे हनुमान बताओ कि उन्होंने निठुरता क्यों धारण कर लिया है । अपने सेवकों को सुख देना यह उनका सहज वाना है । स्वभाव है । क्या कभी राम जी मुझे भी याद करते हैं ?  राम जी अपने सभी भक्तों को याद करते हैं फिर भी देरी देखकर अथवा दुख देखकर कभी-कभी भक्त को ऐसा लगता है कि शायद भगवान ने हमें भुला दिया है । लेकिन भगवान भक्त को कभी नहीं भुलाते । काल और कर्म वश दुख तो सबको स्पर्श करता है । लेकिन भक्त के पास भगवान की कृपा पहले आ जाती है दुख बाद में आता है । दुख प्रत्यक्ष होता है तो वह दिखता है लेकिन कृपा अप्रतक्ष्य होती है इसलिए भक्त कभी-कभी कृपा का आभास नहीं कर पाता अथवा देरी से कर पाता है ।

 

 

सीताजी ने कहा कि हे तात क्या कभी राम जी के श्याम शरीर का दर्शन करके हमारे नयन शीतल होंगे ? अर्थात क्या मुझे रामजी के दर्शन का कभी सौभाग्य मिलेगा ? यह कहते और सोचते ही सीता जी के नयनों में जल भर आया और उनसे कुछ बोला नहीं जा रहा था । सीताजी ने इतना ही कहा कि हे नाथ आपने तो मुझे बिल्कुल ही भुला दिया ।

 

 

सीता जी को इस प्रकार रामजी के विरह में व्याकुल देखकर हनुमानजी बहुत ही कोमल और विन्रम वाणी में बोले कि हे माता रामजी अपने छोटे भाई लक्ष्मण जी के साथ कुशलपूर्वक हैं । सहज कृपा के भंडार रामजी केवल आप के दुख दे ही दुखी हैं । अर्थात उनको जो दुख है वह आप के दुखी होने से है । दूर होने से है । हे माता आप अपने हृदय में किसी तरह का भी संशय न रखें क्योंकि राम जी आपसे दुगुना प्रेम करते हैं ।

 

 

हनुमानजी ने कहा कि हे माता अब हृदय में धैर्य धारण करके रामजी का संदेश सुनिए । ऐसा कहते ही हनुमानजी गदगद हो गए और उनके नयन अश्रुओं से भर गए । हनुमान जी की इस (गदगद) अवस्था में कुछ कहा नहीं जा रहा था तब हनुमान जी के हृदय में स्थित राम जी ने ही सीता जी के वियोग को कहना शुरू किया ।


। जयश्रीराम 

। जयश्रीहनुमान 

 

Wednesday, November 12, 2025

श्रीसुन्दरकाण्ड भाग-१५- सीताजी का रामनामांकित मुँदरी को पहचानना और हनुमानजी से परिचय

 

सीता जी ने मुँदरी की चमक को देखकर सोचा कि मानो अशोक वृक्ष ने अंगार दे दिया है । और यह सोचकर हर्षित होकर उसे हाथ में ले लिया ।  हाथ में लेते ही उन्होंने देखा कि यह तो परम सुंदर मन को हर लेने वाली मुद्रिका है जिस पर राम नाम अंकित हैं ।


  वे चकित होकर उसे देख रही थीं । पहचानने पर उन्हें हर्ष हुआ और फिर विषाद भी हुआ जिससे उनका ह्रदय अकुला उठा । उन्हें हर्ष इस बात का हुआ कि यह तो राम जी के पास से आई है और राम जी की निशानी है । विषाद इस बात का हुआ कि यह तो राम जी के पास थी  यहाँ कैसे आ गई ? सब कुछ ठीक तो है ।


वे मन में सोचने लगीं कि राम जी तो अजेय हैं । उन्हें कोई देवता, दानव, नाग, गंधर्व, राक्षस आदि कोई भी तीनों लोकों और चौदहों भुवनों में कोई भी नहीं जीत सकता । वहीं दूसरी ओर इसे माया से बनाया भी नहीं जा सकता । फिर यह यहाँ कैसे आ गई ? सीता जी इसी तरह अनेकों विचार कर रही थीं । तब हनुमान जी मधुर वाणी में राम जी के गुणगणों को गाने लगे । जिसे सुनते ही सीता जी के सारे दुख दूर हो गए । यह राम जी की कथा और गुणों का प्रताप है ।


सीता जी मन लगाकर सुनने लगीं और हनुमान जी ने आरंभ से सारी कथा सुना दिया । कथा शुरू से आरंभ करके पूरी ही सुनानी चाहिए । और मन लगाकर कथा सुनने पर दुख तो दूर होते ही हैं ।


फिर सीता जी ने कहा  कि भाई जिसने कानों को अमृत तुल्य कथा सुनाई है वे प्रगट क्यों नहीं होते । राम कथा अमृत तुल्य ही है जो जीवन में नवीनता लाती है । आशा देकर निराशा का अंत करती है । बशर्ते कथा को मन लगाकर किसी रामभक्त वक्ता से सुना जाय ।


यह सुनकर हनुमानजी सीताजी के थोड़ा पास गए । हनुमानजी को देखकर सीताजी को संदेह हुआ । आश्चर्य हुआ । इसलिए वे हनुमान जी के तरफ पीठ करके बैठ गईं । लंका माया नगरी थी । यहाँ के राक्षस तरह-तरह की मायावी विद्याएँ जानते थे । और  राक्षस तरह-तरह के रूप भी धरना जानते थे । इसलिए सीता जी को संदेह हुआ कि कहीं यह धोखा तो नहीं है ।


तब हनुमान जी महाराज बोले कि हे माता जानकी मैं भगवान राम का दूत हूँ । मैं   करुणानिधान की सच्ची शपथ करके कह रहा हूँ ।  भगवान राम के अनेकों नाम हैं । वे बहुनाम हैं । उनका एक नाम करुणानिधान भी है । यह नाम सीता जी को बहुत प्रिय है । विवाह के पूर्व ही पार्बतीजी ने सबसे पहले रामजी के इस नाम से सीताजी को परिचित कराया था । इसलिए सीताजी रामजी को करुणानिधान ही कहती हैं ।


  सीताजी को विश्वास हो जाय कि हनुमानजी को रामजी ने ही भेजा है इसलिए हनुमानजी ने करुणानिधान नाम का ही प्रयोग किया । हनुमानजी महाराज बोले कि हे माता यह मुद्रिका मैंने ही लाई है । राम जी ने आपको अपनी निशानी यह मुद्रिका दिया है ।


 सीता जी ने हनुमानजी से कहा कि नर और वानर का संग कैसे हुआ । किस प्रकार हुआ । आप यह बताएँ । तब हनुमान जी ने रामजी की और सुग्रीवजी की मित्रता की सारी कथा सीताजी को कह सुनाई ।


हनुमानजी के प्रेमपूर्वक कहे हुए बचनों को सुनकर सीताजी को हनुमानजी पर विश्वास हो गया । सीताजी ने जान लिया कि मन, वचन और कर्म से हनुमानजी कृपा से सागर रामजी के सेवक हैं ।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय श्रीहनुमानजी ।।

Saturday, October 18, 2025

सुन्दरकाण्ड-१४ - त्रिजटा का स्वप्न और हनुमान जी का अशोक वृक्ष से मुँदरी गिरना

 

लंका में त्रिजटा नाम की एक राक्षसी रहती थी । जिसे रावण ने अशोक वाटिका में सीताजी की रखवाली में लगा रखा था । त्रिजटा निपुण बुद्धि वाली थी । और उसे राम जी के चरणों में अनुराग था । उसने सभी राक्षसियों को बुलाकर कहा कि सीता जी की सेवा करके अपना हित साधन कीजिए । क्योंकि मैंने एक सपना देखा है जिसमें एक बानर ने लंका को जला दिया है और सारी राक्षसी सेना का संहार कर दिया है । रावण गधे पर सवार होकर दक्षिण दिशा की ओर जा रहा है और उसकी बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं तथा सिर मुड़ा (केश रहित है ) हुआ है । और लंका का राज्य मानो विभीषण को मिल गया है ।

 

 सारे राज्य में राम जी के विजय का डंका बज रहा है और इसके बाद राम जी ने सीता जी को लंका से वापस अपने पास बुलवा लिया है । मैं जोर से कह रहीं हूँ कि यह सपना कुछ ही दिनों में सत्य हो जाएगा । त्रिजटा के ऐसे बचन सुनकर सारी राक्षसियाँ डर गईं और सीता जी के चरणों में गिर गईं । इसके बाद राक्षसियाँ जहाँ-तहाँ चलीं गईं । और सीता जी अपने मन में चिंतित होकर सोचने लगीं कि नीच राक्षस एक महीना व्यतीत होने पर मुझे मार डालेगा ।

 

 सीता जी त्रिजटा से हाथ जोड़कर बोलीं कि माता आप इस बिपति की घड़ी में मेरी संगिनी हो । लेकिन अब मुझसे दुसहनिये विरह सहा नहीं जाता । इसलिए कोई उपाय कीजिए जिससे मैं अपनी देंह तज सकूँ । माता जी आप काठ ले आइये और चिता बना दीजिए और फिर उसमें आग लगा दीजिए । रावण के काँटे के समान कानों को बीध डालने वाले बचन को कौन सुनें  ? अतः हे बुद्धिमती राम जी के प्रति मेरी प्रीति को सत्य कर दीजिए ।

 

सीताजी के ऐसे बचनों को सुनकर त्रिजटा ने उनका चरण पकड़कर रामजी के प्रताप, बल और यश को सुनाकर समझाया । त्रिजटा ने कहा कि हे सुकुमारी रात में अग्नि नहीं मिलेगी । ऐसा कहकर वह अपने घर को चली गई ।

 

सीता जी कहने लगीं कि बिधाता ही मेरे प्रतिकूल हो गया है ।  इसलिए अग्नि नहीं मिलेगी  और मेरा दुख दूर नहीं होगा । आकाश में प्रगट रूप से (तारो में) अग्नि दिखाई दे रही है । लेकिन पृथ्वी पर कोई भी तारा नहीं आ रहा है । चंद्रमा अग्निमय दिख रहा है लेकिन वह भी मुझे अभागी जानकर अग्नि स्रवावित नहीं कर रहा है । सीता जी अशोक वृक्ष से ही कहने लगीं के अशोक आप ही मेरी विनती सुन लीजिए और मेरा शोक दूर करके अपने नाम को सत्य कर दीजिए । आपके नए कोमल पत्ते अग्नि के समान के हैं (उनमें अग्नि का आभास  हो रहा है) । इसलिए आप मुझे अग्नि दे दीजिए । जिससे मेरी वेदना और न बढ़े । यानी समाप्त हो जाए ।

 

इसप्रकार सीता जी को राम जी के विरह में बहुत आकुल देखकर वह क्षण हनुमान जी महाराज को एक कलप (लगभग चार करोड़ बत्तीस लाख वर्ष) के समान व्यतीत हुआ ।

 

हनुमान जी महाराज ने ह्रदय में बिचारकर, उचित समय जानकर राम जी की मुँदरी गिरा दी । सीता जी ने मुँदरी की चमक को देखकर सोचा कि मानो अशोक वृक्ष ने अंगार दे दिया है । और यह सोचकर हर्षित होकर उसे हाथ में ले लिया ।   

 

  जय श्रीराम   

  जय श्रीहनुमान   

Sunday, October 12, 2025

सुंदरकाण्ड-१३ अशोका वाटिका में सीताजी और रावण का संवाद

 

हनुमान जी महाराज ने फिर से वही छोटा सा आकर बना कर अशोक वन में प्रवेश कर गए । सीताजी को देखकर हनुमानजी महाराज ने मन ही मन प्रणाम किया । बैठे-बैठे ही सीताजी रात बिताती थीं । उनका शरीर दुबला हो गया था । सिर पर जटा थी जिसमें एक वेणी लगी हुई थी । वे अपने ह्रदय में राम जी के गुण समूहों का सुमिरण करती रहती थीं ।

 

सीताजी अपने नेत्रों को अपने पैरों की ओर ही लगाए थीं । और मन भगवान श्रीराम के चरण कमलों में लीन था । सीताजी को दुखी देखकर हनुमानजी को बड़ा दुख हुआ ।

 

हनुमान जी महाराज अशोक वाटिका में पहुँचकर पेड़ के पल्लव (पत्तों के समूह-झुरमुट) में अपने को छिपा लिए थे । और विचारकर रहे थे कि क्या करूँ । अर्थात सीता जी के सामने जाऊं अथवा पहले मुँदरी गिराकर फिर बाद में परिचय करूँ ।

 

इसी समय बहुत सी नारियों के साथ, राजसी ठाठ से रावण वहाँ आया । उसने सीता जी जी को अनेक तरह से समझाया । साम, दान भय और भेद का भी सहारा लिया । रावण ने कहा कि हे वुद्धिमती, सुमिखी सीता मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि मंदोदरी आदि सभी रानियों को आपकी दासी बना दूँगा बस एक बार आप मुझे ‘विलोकि’ लीजिए-

 

‘तव अनुचरी करउँ पन मोरा । एक बार विलोकु मम ओरा’ ।।

 

 

जब सीता जी ने गंगा जी को प्रणाम करके आशीर्वाद माँगा था तो गंगा जी कहा कि हे रघुवीर प्रिय वैदेही आपका प्रभाव किसे पता नहीं है । जिसे एक बार आप विलोकि लेती हैं वह लोकपाल हो जाता है । सारी सिद्धियाँ हाँथ जोड़कर आपकी सेवा में रहती  हैं ।

 

‘लोकप होहिं विलोकत तोरे तोहिं सेवत सब सिधि कर जोरे ।।

 

रावण जब सीता जी का हरण करने के लिए पंचवटी गया था तो सीताजी को देखकर वह पहचान गया था कि ये तो जगतजननी हैं । इसलिए उसने मन ही मन सीता जी के चरण कमलों की वंदना की थी--‘मन महुं चरन वंदि सुख माना’ सीताजी के विलोकने मात्र से उसे विशिष्ट लोक की प्राप्ति हो जाती, उसके पाप क्षीण हो जाते और वह अवध्य हो जाता ।

 

तिनके की ओट करके परम स्नेही भगवान श्रीरामजी का सुमिरन करके सीता जी ने कहा कि हे रावण तू ऐसा क्यों नहीं समझ पाता कि नलिनी कभी जुगनूँ के प्रकाश से विकसित नहीं होती । उसे सूर्य का प्रकाश चाहिए होता है । अरे दुष्ट ! क्या रघुवीर राम जी के वाणों का प्रताप तुझे याद नहीं है (मारीच ने रामजी के वाणों का प्रताप रावण को सुनाया था ) । सीताजी ने कहा कि सूने से (रामजी और लक्ष्मणजी की अनुपस्थिति में चोरी से ) तूने मेरा हरण करके यहाँ ले आया है । हे अधम, निलज्ज तुझको इसपर (इस नीचता पर) लज्जा नहीं आती ।

 

अपने को जुगनूँ के समान और राम जी को सूर्य के समान सुनकर, तथा सीता जी के अन्य कठोर वचनों को सुनकर रावण बहुत ही खिसिया गया और तलवार निकालकर बोला कि सीता तुम मेरा अपमान कर रही हो और इसलिए इस कठिन (तीक्ष्ण) कृपाण से मैं तुम्हारा सिर काट डालूँगा । या तो मेरी बात मान लो अथवा तुम्हें अपने प्राण गवाँने पड़ेंगे ।

 

सीताजी ने कहा कि रावण  भगवान श्रीराम की भुजाएँ नीले कमल की रस्सी की भाँति बहुत सुंदर हैं । और हाथी के सूंड की तरह पुष्ट, लम्बी और मजबूत हैं । हे मूर्ख सुन ! या तो राम जी की भुजाएँ मेरे कंठ को स्पर्श करेंगी अथवा तेरी यह कठिन कृपाण- मेरी यह अटल प्रतिज्ञा है ।

सीता जी ने चन्द्रहास कृपाण से कहा कि राम जी के विरह रुपी अग्नि से जलने के परिताप को आप मिटा दीजिए । आपकी श्रेष्ठ धार तीक्ष्ण और सीतल है आप मेरे बड़े भारी दुख को दूर कर दीजिए । सीता जी के ऐसे वचनों को सुनकर रावण मारने के लिए दौड़ा, तब मंदोदरी ने नीति युक्त बाते कहकर उसे रोक दिया । तब रावण ने सभी राक्षसियों को बुलाकर कहा कि तुम लोग सीता को  तरह-तरह से भयभीति करो । यदि इन्होंने एक महीने में मेरा कहना नहीं माना तो फिर मैं अपनी कृपाण निकालकर इन्हें मार डालूँगा ।

 

रावण राक्षसियों को ऐसा आदेश देकर महल को चला गया । पिचासनियों के समूह तरह-तरह  के रूप बना-बनाकर सीता जी को डराने लगीं । हनुमानजी महाराज मन ही मन सोच रहे थे कि किस प्रकार माताजी से परिचय किया जाय । एक बार तो उनके मन में राक्षसियों को दंडित करने का बिचार आया लेकिन इससे सीताजी को रामजी का संदेश सुनाने में बांधा आ सकती थी इसलिए हनुमानजी ने इस बिचार को त्याग दिया । 


ग्रंथों में ऐसा भी वर्णन मिलता है कि रावण को भी स्वप्न से यह पता चल गया था कि हनुमानजी अशोक वाटिका में आ गए हैं इसलिए ही रावण सीताजी से सम्वाद करने आया, उनसे अशोभनीय बातें किया और उन्हें तलवार लेकर मारने दौड़ा और पिचासनियों को सीताजी को परेशान  करने के लिए बोल कर गया जिससे हनुमानजी जाकर रामजी से ये सब बताएं और रामजी जल्दी आकर उसका वध कर दें 

 

। जय श्रीराम 

। जय हनुमानजी 

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