हनुमानजी महाराज ने रावण
से कहा कि हे रावण मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती कर रहा हूँ कि तुम अभिमान को छोड़कर
मेरी सीख को सुन लो । तुम बिचार करके अपने कुल को देखो और भ्रम को छोड़कर भक्तों के
भय को हरने वाले भगवान श्रीराम का भजन करो । रावण का कुल बहुत ही उत्तम था । इसके
कुल में सब भगवान का भजन करने वाले थे । इसलिए हनुमान जी ने कहा कि तुम भी अपनी
कुल परंपरा के अनुसार भगवान का भजन करो ।
हनुमानजी ने कहा कि काल
देवता, राक्षस और चर-अचर सबको खा जाता है । अर्थात कोई और कुछ भी ऐसा नहीं है जो
काल का ग्रास न बनता हो । लेकिन यह काल भी जिसके डर से बहुत डरता है उन भगवान
श्रीराम से किसी भी स्थिति में बैर मत करो । और मेरे कहने से जनकसुता सीताजी को
वापस कर दो ।
देवताओं की आयु बहुत अधिक
होती है । इसलिए ही उन्हें अमर कहा जाता है । लेकिन वस्तुतः वे अमर नहीं हैं । इस संसार
में कोई भी अविनाशी नहीं है । एक न एक दिन सबका विनाश होता है । केवल और केवल
एकमात्र भगवान ही अविनाशी हैं । इस प्रकार काल सबको खा जाता है-
राजा रंक मुरख निपुन ऋषि
महर्षि सब देव ।
रामदास मरने चले बचा नहि
जग केव ।।
हनुमानजी ने रावण से कहा
कि करुणा के सागर खरारि भगवान श्रीराम शरण में आए हुए का पालन करने वाले हैं ।
अर्थात जो कोई भी उनकी शरण में जाता है उसे वे ठुकुराते नहीं हैं । अपना लेते हैं
और उसका हर तरह से पालन करते हैं । इसलिय तुम भी भगवान श्रीराम के शरण में चले जाओ
। शरण में जाने से तुम्हारे सारे अपराधों को छमा करके तुम्हें अपना लेंगे । अपनी
शरण में रख लेंगे ।
रामजी शरण में आए हुए जन का अपराध नहीं देखते
हैं । उसके सारे अपराध को छमा करके निर्भय कर देते हैं और रख लेते हैं । इतना ही
नहीं सदा-सदा के लिए रख लेते हैं । जिसको एक बार अपना कह दिया । उसे कभी नहीं
छोड़ते । किसी भी स्थिति और परिस्थिति में नहीं छोड़ते । यह भगवान श्रीराम का वाना-स्वभाव
है ।
।
।। जय श्रीहनुमान ।।
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