हनुमानजी को देखकर रावण दुर्वचन कहकर जोर से हँसा । फिर अपने पुत्र अक्ष कुमार के बध की बात स्मरण में आते ही उसके ह्रदय में दुःख उत्पन्न हुआ । रावण ने हनुमानजी से कहा कि हे बंदर तुम कौन हो ? और किसके बल से वन को उजाड़कर नष्ट कर डाला है । मूर्ख तूँ बहुत निडर दिखलाई पड़ रहा है । लगता है तुमने अपने कानों से मेरे बारे में सुना नहीं है । तुमने किस अपराध से राक्षसों का बध किया है । हे मूर्ख बता कि क्या तुझे अपने प्राणों का भय नहीं है ।
हनुमानजी महाराज ने कहा कि हे रावण सुनों जिनका
बल पाकर माया समस्त व्रह्मान्डों की रचना करती है ।
हे रावण जिनके
बल से व्रह्मा जी सृष्टि की रचना,
विष्णुजी सृष्टि का पालन और शंकर जी सृष्टि का संहार करते हैं । जिनके बल से
सहस्त्र मुख वाले शेष जी वन, पर्वत सहित समस्त व्रह्मान्डों को अपने सिर पर धारण
करते हैं ।
हनुमान जी ने आगे कहा कि
जो तुम जैसे मूर्खों को शिक्षा देने के लिए और देवताओं की रक्षा करने के लिए नाना
शरीर (अवतार) धारण करते हैं ।
जिन्होंने भगवान शंकर के
कठोर धनुष को तोड़कर उसके साथ राजाओं के दल का मद चूर्ण कर दिया है । और जिन्होंने
खर, दूषण, त्रिसरा अरु बालि, जो सबके सब बहुत ही बलशाली थे, का बध कर दिया है ।
जिनके लेशमात्र बल से तुमने सम्पूर्ण चराचर जगत को जीति लिया है मैं उन्ही भगवान
राम का दूत हूँ जिनकी प्रिय पत्नी को तुम हरण करके ले आये हो ।
इस प्रकार हनुमान जी महाराज ने रावण की सभा में
रावण द्वारा पूछे गए पहले प्रश्न का इतना बड़ा उत्तर दिया ।
पहला प्रश्न यही था कि हे
वानर तुम कौन हो और किसके बल से हमारी वाटिका को तहस-नहस कर दिया है ।
हनुमानजी महाराज ने बताया कि इस समस्त संसार
में एक मात्र मेरे प्रभु राम का ही बल है । जो बल व्रह्मा, शिव और नारायण में है
वह भी मेरे स्वामी का ही है । शेष नाग में भी मेरे स्वामी का ही बल है । सबमें
मेरे स्वामी का ही बल है । यहाँ तक जो लेशमात्र बल तुममें है वह भी मेरे स्वामी का
है । अर्थात तुम पूछ रहे हो कि किसके बल से मैंने तुम्हारी वाटिका को उजाड़ा है ।
तो सुनों जिसके बल से सब में कुछ करने की शक्ति आती है मैं उन्हीं भगवान राम का
दूत हूँ जिनकी प्रिय पत्नी का तुमने धोखे से हरण कर लिया है ।
।। जय श्रीसीताराम ।।
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