अपने पुत्र का वध सुनकर रावण क्रोधित हो उठा । और उसने बलवान मेघनाद को भेजा । रावण ने कहा कि हे पुत्र उसे मारना नहीं । बाँध लाना । देखा जाय वह बंदर कहाँ से आया है । अर्थात उसके बारे में जाना जाय कि वह कहाँ का है । और क्यों आया है । या उसे किसी ने भेजा है । इंद्र को युद्ध में जीतने वाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला और उसे भाई का वध सुनकर क्रोध हो आया ।
हनुमानजी महाराज ने देखा कि इस बार भयानक योद्धा आया है । तो वे कटकटाकर गर्जे और दौड़े । हनुमान जी ने एक बहुत ही विशाल वृक्ष को उखाड़ लिया । और उसे मेघनाद के रथ पर फेका । मेघनाद का रथ टूट गया । इस प्रकार मेघनाद रथ से बिहीन हो गया । मेघनाद के साथ बड़े-बड़े योद्धा थे । हनुमानजी उन्हें पकड़-पकड़कर अपने शरीर से ही रगड़ना शुरू कर दिया । योद्धाओं को मारकर हनुमानजी मेघनाद से लड़ने लगे । ऐसा लग रहा था कि कोई दो गजराज लड़ रहे हों ।
हनुमानजी ने मेघनाद के ऊपर मुष्टिक का प्रहार करके पेड़ पर चढ़ गए और उसे एक क्षण के लिए मूर्छा आ गई । मूर्छा दूर होने पर मेघनाद ने फिर से बहुत सारी माया दिखाई । लेकिन पवनसुत हनुमानजी उससे जीते नहीं जा रहे थे । अर्थात वह असफल ही हो रहा था । तब उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया । हनुमानजी ने बिचार किया कि इस अस्त्र की अपार महिमा है । यदि मैं इसके वार को नहीं सहूँगा तो इस अस्त्र का निरादर हो जायेगा । इसकी महिमा मिट जायेगी । यह सोचकर हनुमानजी ने उसका वार सह लिया । ब्रह्मास्त्र के लगने पर हनुमानजी मूर्छित होकर गिर गए । और गिरते हुए भी उन्होंने मेघनाद की सेना का संहार किया ।
मेघनाद ने देखा कि हनुमानजी मूर्छित हो गए हैं तब उसने नागपाश से हनुमानजी को बाँधकरले गया ।
शंकरजी पार्वती माता से कहते हैं कि हे भवानी जिनका नाम जप करके ज्ञानी लोग जन संसार रुपी बंधन को काट कर मुक्त हो जाते हैं । ऐसे भगवान राम के दूत हनुमानजी कहीं बंधन में आ सकते हैं क्या ? अर्थात हनुमानजी को कोई बाँध नहीं सकता । हनुमानजी ने रामजी का कार्य पूरा करने के लिए स्वयं को जान बूझकर बँधा लिया है ।
जब राक्षसों ने सुना कि जो बंदर अशोक वाटिका में फल खा रहा था बंदी बना लिया गया है तब वे लोग तमाशा देखने के लिए रावण की सभा में आ गए । हनुमानजी ने रावण की सभा को जाकर देखा । उसकी इतनी प्रभुता थी जिसका कोई वर्णन नहीं हो सकता । देवता और दिग्पाल हाथ जोड़कर बहुत ही विनीत भाव से खड़े हुए थे । सभी लोग डरे हुए रावण की भृकुटी की तरफ देख रहे थे । अर्थात कब किसकी ओर रावण भृकुटी टेढ़ी कर दे कोई पता नहीं था । इस प्रकार सब डरे हुए रावण का रुख देख रहे थे ।
रावण का इतना प्रताप देखकर भी हनुमानजी के मन में कोई शंका नहीं हुई । अर्थात कोई भय नहीं हुआ । वे उसकी सभा में इस प्रकार पहुँचे और इस प्रकार खड़े हुए थे जैसे सांपों के झुण्ड में गरुड़जी निडर रहते हैं । अर्थात जिस प्रकार गरुड़ जी को सांपों को देखकर भय होता है । डर जाते हैं । उसी प्रकार हनुमानजी को देखकर उल्टे राक्षसों को भय हुआ ।
।। जय श्रीसीताराम ।।
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