सीताजी से आशिर्बाद पाकर हनुमानजी महाराज ने सीताजी से कहा कि हे माता ! सुनिए- मुझे सुंदर फल से युक्त वृक्षों को देखकर बड़ी भूँख लग गई है । जैसे छोटे बच्चे को खाने-पीने वाली चीज देखकर भूँख लग जाती है और वह अपनी माता से माँगने लग जाता है । ठीक इसी भाव से हनुमान जी को सुंदर-सुंदर फल देखकर भूँख लग गई और उन्होंने माता सीता से निवेदन भी कर दिया ।
माता सीता ने कहा कि हे बेटा ! सुनो इस वन की रखवाली बड़े-बड़े भारी योद्धा राक्षस करते हैं । अर्थात रावण ने इस वाटिका की रक्षा के लिए बड़े-बड़े योद्धाओं को लगा रखा है । हनुमान जी ने कहा के माता यदि आप मन में प्रसन्न होकर आज्ञा दें तो मुझे योद्धाओं का भय नहीं है ।
सीता जी ने देखा कि हनुमान जी बल और बुद्धि में निपुण हैं इसलिए कहा कि जाओ और रामजी के चरणों को हृदय में धरकर मधुर फल खाओ । अर्थात राम जी को भोग लगाकर, राम जी को निवेदित करके मधुर-मधुर फल खाइए ।
हनुमानजी ने माता सीता के चरणों में शिर नवाकर अर्थात प्रणाम करके वाटिका में प्रवेश किया । और फल खाकर पेड़ों को तोड़ने लगे । वाटिका की रखवारी में बहुत से योद्धा थे । कुछ योद्धाओं को हनुमानजी ने मार दिया और कुछ रावण के पास जाकर पुकारने लगे ।
राक्षस योद्धा रावण से बोले कि हे स्वामी ! एक बहुत बड़ा वानर आया है जिसने अशोक वाटिका को उजाड़ दिया है । उसने फल खाएँ हैं और वृक्षों को उखाड़ दिया है । तथा रक्षकों को मसल-मसलकर पृथ्वी पर गिरा दिया है । ऐसा सुनकर रावण ने बहुत सारे योद्धाओं को भेजा । जिन्हें देखकर हनुमानजी महाराज ने गर्जना की । हनुमान जी ने सभी राक्षसों का संहार कर दिया । कुछ अधमरे राक्षस चिल्लाते हुए रावण के पास गए ।
फिर रावण ने अपने बेटे अच्छकुमार को भेजा । वह अपने साथ अनेकों श्रेष्ठ योद्धाओं को लेकर चला । उसे आता हुआ देखकर हनुमान जी ने एक वृक्ष को पकड़कर-हाथ में लेकर उसे ललकारा और उसे सहज ही मारकर बड़े जोर से गर्जना की ।
अक्ष कुमार के साथ जो योद्धा आए थे उनमें से कुछ को मार डाला, कुछ को मसल डाला और कुछ को पकड़कर धूल में मिला दिया-गाड़ दिया । और कुछ फिर जाकर रावण से बोले कि हे स्वामी वह मर्कट बड़ा ही बलवान है ।
।। जय श्रीसीताराम ।।
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