राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।
अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहिं श्रीरघुराई ।।
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Sunday, December 29, 2024

श्रीराम गीता-भाग १८ (अंतिम भाग )- भगवान राम का हनुमान जी को अवतार की दृष्टि से अपना परिचय देना

 

जो समस्त लोकों एवं संपूर्ण देहधारियों को मोह में डालने वाली है, वह माया भी मुझ ईश्वर के आदेश से ही सारा व्यवहार चलाती है ।

            

  जो मोहरूपी कलिल का नाश करके सदा परमात्म पद का साक्षात्कार कराती है, वह व्रह्मविद्या भी मुझ महेश्वर की आज्ञा के ही अधीन है । इस बिषय में बहुत कहने से क्या लाभ यह सारा जगत मेरी शक्ति से ही उत्पन्न हुआ है, मुझसे ही इस विश्व का भरण-पोषण होता है तथा अंततोगत्वा सबका मुझमें ही प्रलय होता है-


बहुनात्र किमुक्तेन मम शक्त्यात्मकंजगत ।।

मयैव पूर्यते विश्वं मय्येव प्रलयं ब्रजेत् ।।

 

मैं ही स्वंयप्रकाश सनातन भगवान ईश्वर हूँ । मैं ही परब्रह्म परमात्मा हूँ । मुझसे भिन्न किसी बस्तु की सत्ता नहीं है । हनुमन ! यह परम ज्ञान मैंने तुमसे कहा है । इसे जानकर जीव जन्म-मृत्यु रूप संसार बंधन से मुक्त हो जाता है ।

 

पवननंदन मैंने माया का आश्रय लेकर राजा दशरथ के घर में अवतार लिया है । वहाँ मैं राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुहन इन चार रूपों में प्रकट हुआ हूँ । यह सारी बात मैंने तुम्हें बता दी । कपिश्रेष्ठ मैंने कृपापूर्वक तुम्हें अपने स्वरूप का परिचय दिया है । इसे सदा हृदय में धारण करते रहना चाहिए । कभी भूलना नहीं चाहिए ।


इसके बाद राम जी अपने और हनुमान जी के मध्य संवाद-श्रीराम गीता की महिमा-महात्म्य बताते हैं । और इसके पढ़ने-सुनने तथा पाठ करने का फल  आदि बताते हैं ।

 

फिर हनुमानजी अपने प्रभु श्रीराम को पहचानकर, जानकर उनकी बहुत सुंदर स्तुति किया।  


।। जय श्रीराम ।।

।। जय श्रीहनुमान ।।

 

Sunday, December 15, 2024

श्रीराम गीता-भाग १५ – भगवान श्रीराम के सर्वात्मक और सर्वशासक स्वरूप का वर्णन - भाग दो )

  

भगवान राम आगे हनुमानजी से कहते हैं कि महतत्व आदि के क्रम से ही मेरे तेज का विस्तार हुआ है । जो संपूर्ण जगत के साक्षी कालचक्र के प्रवर्तक हिरण्यगर्भस्वरूप  मार्तण्डदेव (सूर्यदेव) हैं, वे भी मेरे ही दिव्य स्वरूप से प्रकट हुए हैं । मैंने उन्हें अपना दिव्य ऐश्वर्य, सनातन योग प्रदान किया है ।

 

कल्प के आदि में मुझसे प्रकट हुए चार वेद मैंने ही ब्रह्माजी को दिए थे । सदा मेरे ही भाव से भावित ब्रह्मा मेरी आज्ञा से सृष्टि करते हैं और मेरे उस दिव्य ऐश्वर्य को सदा वहन करते हैं ।

  सर्वज्ञ ब्रह्मा मेरे आदेश से ही संपूर्ण लोकों के निर्माण में संलग्न हुए हैं । आत्मयोनि ब्रह्मा मेरी ही आज्ञा से चार मुखों वाले होकर सृष्टि रचना करते हैं ।

 

 संपूर्ण लोकों के उद्भव तथा प्रलयस्थान जो अनंत भगवान नारायण हैं, वे भी मेरी ही परम मूर्ति हैं जो जगत के पालन में लगे हैं । जो संपूर्ण विश्व के संहारक भगवान कालरूद्र हैं, वे भी मेरे ही शरीर हैं तथा मेरी ही आज्ञा से सदा संहार कार्य में प्रवृत्त रहते हैं ।

 

  जो हव्यभोजी देवताओं को हव्य पहुँचाते हैं, कव्यभोजी पितरों को कव्य की प्राप्ति कराते हैं तथा अन्न का परिपाक करते रहते हैं वे अग्नि देव भी मेरी शक्ति से प्रेरित हो लोगों के खाये हुए आहार-समूह का दिन-रात पाचन करते हैं ।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय श्रीहनुमान ।।

Sunday, September 1, 2024

श्रीराम गीता-भाग १४ (भगवान श्रीराम के सर्वात्मक और सर्वशासक स्वरूप का वर्णन- भाग एक)

 

भगवान श्रीराम कहते हैं कि पवननंदन ! मैं संपूर्ण लोकों का एकमात्र स्रष्टा, सभी लोकों का एकमात्र पालक, सभी लोकों का एकमात्र संहारक, सबकी आत्मा सनातन परमात्मा हूँ ।

सर्वलोकैकनिर्माता  सर्वलोकैकरक्षिता ।

सर्वलोकैकसंहर्ता सर्वात्माहं  सनातनः ।।

 

मैं समस्त वस्तुओं के भीतर रहने वाला अन्तर्यामी आत्मा तथा सबका पिता हूँ । सारा जगत मेरे ही भीतर स्थित है, मैं इस संपूर्ण जगत के भीतर स्थित नहीं हूँ । वत्स ! तुमने जो मेरा अद्भुत स्वरूप देखा है, यह मेरी एक उपमा मात्र है । इसे मैंने माया द्वारा दिखाया है । मैं सभी पदार्थों के भीतर रहकर संपूर्ण जगत को प्रेरित करता हूँ । यह मेरी क्रिया शक्ति का परिचय है ।

                   

हनुमन ! यह संपूर्ण विश्व मेरे सहयोग से ही चेष्टाशील होता है । यह मेरे स्वभाव का ही अनुसरण करने वाला है । मैं ही सृष्टिकाल में समस्त जगत की रचना करता हूँ । तथा एक दूसरे रूप से इसका संहार भी करता हूँ । ये दोनों प्रकार की अवस्थाएँ मेरी ही हैं ।

 

मैं आदि,मध्य और अंत से रहित तथा माया तत्व का प्रवर्तक हूँ । मैं ही सृष्टि के आरंभ में प्रधान और पुरुष दोनों को क्षुब्ध करता हूँ । फिर परस्पर संयुक्त हुए उन दोनों से ही सबकी उत्पप्ति होती है ।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय श्रीहनुमान ।।

Saturday, August 10, 2024

श्रीराम गीता- भाग तेरह (भक्ति योग- पाँच)-महायोगेश्वरेश्वर भगवान राम

 

(भगवान श्रीराम का हनुमानजी को भक्ति योग का उपदेश )

 

मेरी आराधना के अभिलाषी अन्य जो तीन प्रकार के भक्त हैं वे भी मुझे ही प्राप्त होते हैं और पुनः लौटकर इस संसार में नहीं आते-

 

अन्ये च ये त्रयो भक्ता मदाराधनकान्क्षिणः ।

तेऽपि मां प्राप्नुवन्त्येव नावर्तन्ते च वै पुनः ।।

 

मैंने ही सम्पूर्ण जगत का विस्तार किया है- जो इस बात को जानता है वह अमृतस्वरूप हो जाता है । मैं इस जगत को स्वभाव से ही वर्तमान देखता हूँ । जिसे महायोगेश्वर साक्षात भगवान ने समयानुसार रचा है । वे ही योगशास्त्र के वक्ता हैं । इसलिए शास्त्रों में उन्हें योगी और मायावी कहा गया है ।

 

  विद्वानों ने उन्हीं महाप्रभु भगवान महादेव को योगेश्वर कहा है । सम्पूर्ण जीवों से महान होने के कारण परमात्मा को महेश्वर कहा गया है और वे ही सबसे परे होने के कारण परमेश्वर कहे जाते हैं । महान ब्रह्मय होने से ही उनका नाम भगवान ब्रह्मा है । यह सब मेरे ही स्वरूप का परिचय है ।

 

जो मुझे इस प्रकार महायोगेश्वरेश्वर जानता है वह अविचल योग से युक्त होता है इसमें संशय नहीं है -

यो मामेवं विजानाति महायोगेश्वरेश्वरम् ।

सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ।।

 

वही मैं सबका प्रेरक परम देव परमानंद का आश्रय ले सर्वत्र विराजमान हूँ । जो योगी सदा इस प्रकार मुझे जानता है वही वेदवेत्ता है । यह सम्पूर्ण वेदों में निश्चित रूप से प्रतिपादित गुह्यतम ज्ञान है । जो प्रसन्नचेत्ता धर्मात्मा एवं अग्निहोत्री हो, उसे इसका उपदेश देना चाहिए ।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय हनुमान ।।

Sunday, August 4, 2024

श्रीराम गीता- भाग बारह (भक्ति योग- चार)


(भगवान श्रीराम का हनुमानजी को भक्ति योग का उपदेश )

 

मैं ही संपूर्ण शक्तियों का प्रवर्तक, निवर्तक सबका आधारभूत तथा अमृत की निधि हूँ

अहं हि सर्वशक्तीनां प्रवर्तकनिवर्तकः ।

आधारभूतः सर्वासां निधानममृतस्य च ।।

 

 मेरी एक सर्वांतर्यामिनी शक्ति ब्रह्माजी के रूप में स्थित होकर विविध नाम-रूप वाले जगत की रचना करती है । दूसरी शक्ति अनंत जगन्नाथ, जगन्मय, नारायण होकर इस विश्व का पालन करती है । तीसरी जो मेरी महाशक्ति है वह संपूर्ण जगत का संहार करती है । उसे तामसी कहा गया है । वह कालात्मा एवं रुद्ररूपिणी है ।

 

  कुछ साधक मुझे ध्यान के द्वारा देखते हैं । दूसरे लोग ज्ञान से, अन्य लोग भक्तियोग के द्वारा मेरा साक्षात्कार करते हैं । तथा कतिपय साधक कर्मयोग के द्वारा मेरा साक्षात्कार करते हैं-

ध्यानेन मां प्रपश्यन्ति केचिज्ज्ञानेन चापरे ।

अपरे भक्तियोगेन कर्मयोगेन चापरे ।।

 

सभी भक्तों में मुझे वह सबसे प्रिय है, जो विशुद्ध ज्ञान के द्वारा मेरी नित्य आराधना करता है, अन्य किसी साधन से नहीं-

 

सर्वेषामेव भक्तानामेष प्रियतरो मम ।।

यो विज्ञानेन मां नित्यमाराधयति नान्यथा ।।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय हनुमान ।।


Thursday, July 25, 2024

श्रीराम गीता- भाग ग्यारह (भक्ति योग- तीन)-धर्मात्माओं का रक्षक तथा वेदद्रोहियों का विनाश करने वाला मैं ही हूँ

 

 (भगवान श्रीराम का हनुमानजी को भक्ति योग का उपदेश )

 

मैंने ही परमेष्ठी ब्रह्मा को कमलपर स्थापना करके उन्हें संपूर्ण वेदों का ज्ञान दिया था । जो उनके मुखों से प्रकट हुए ।

 

मैं ही समस्त योगियों का अविनाशी गुरू हूँ । धर्मात्माओं का रक्षक तथा वेदद्रोहियों का विनाश करने वाला मैं ही हूँ –

 

अहमेव हि सर्वेषां योगिनां गुरुरव्ययः

धार्मिकाणां च गोप्ताहं निहन्ता वेदविद्विषाम् ।।

 

मैं ही योगियों को समस्त संसार बंधन से मुक्त करता हूँ । संसार का हेतु भी मैं ही हूँ और समस्त संसार से परे भी मैं ही हूँ –

अहं वै सर्वसंसारान्मोचको योगिनामिह ।

संसारहेतुरेवाहं सर्वसंसार वर्जितः ।।

 

मैं ही स्रष्टा, पालक और संहारक हूँ । माया का स्वामी भी मैं ही हूँ । मेरी शक्तिस्वरूपा माया समस्त लोक को मोह में डालने वाली है-

अहमेव हि संहर्ता स्रष्टाहं परिपालकः ।

मायावी मामिका शक्तिर्माया लोकविमोहिनी’ ।।

 

जो मेरी ही पराशक्ति है, उसे विद्या कहते हैं । मैं उसी विद्या के द्वारा योगियों के ह्रदय में रहकर माया का विनाश करता हूँ ।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय हनुमान ।।

Friday, July 12, 2024

श्रीराम गीता- भाग दस –भक्तों के लिए रामजी की प्रतिज्ञा का वर्णन (भक्ति योग-दो)

 

धार्मिक वेदवादी विद्वान ज्ञान दृष्टि से मुझे देखते हैं । जो भक्तजन मेरी उपासना करते हैं, उनके निकट मैं नित्य निवास करता हूँ- ‘तेषां संनिहितो नित्यं ये भक्ता मामुपासते’ ।

 

जो ब्राह्मण, क्षत्रीय तथा धार्मिक वैश्य मेरी आराधना करते हैं, उन्हें मैं अपना परमानंदमय धाम-परमपद प्रदान करता हूँ । दूसरे भी शूद्र आदि जो विपरीत कर्म में लगे रहने वाले तथा नीच जाति के हैं, वे भी यदि भक्ति भाव से मेरा भजन करते हैं तो इस संसार बंधन से मुक्त हो जाते हैं और समयानुसार मुझमें मिल जाते हैं ।

 

  मेरे भक्तों का कभी विनाश नहीं होता । मेरे भक्तों के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । मैंने पहले से ही यह घोषणा कर रक्खी है कि मेरे भक्त का नाश नहीं होता है-

न मद्भक्ता विनश्यन्ते मद्भक्ता वीतकल्मषाः ।

आदावेत्तप्रतिज्ञातं न में भक्तः प्रणश्यति ।।

 

जो मूढ़ मेरे भक्त की निंदा करता है, वह मुझ देवाधि भगवान की ही निंदा में रत है । जो भक्तिभाव से भक्त का पूजन करता है, वह सदा मेरी ही पूजा में लगा हुआ है । जो मेरी आराधना के निमित्त से मुझे पत्र-पुष्प, फल और जल अर्पित करता है तथा मन और इन्द्रियों को काबू में रखता है, वह मेरा भक्त माना गया है ।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय हनुमान ।।

Thursday, July 11, 2024

श्रीराम गीता- भाग नौ –भक्ति योग-(एक)

 

   ( भगवान श्रीराम का हनुमानजी को उपदेश )

 

हे पवननंदन अब मैं पुनः जो बात बता रहा हूँ उसे एकाग्र होकर सुनों । जिससे इस रूप की प्राप्ति होती है तथा जिससे यह जगत व्यवहार में प्रवृत्त होता है वह तत्व मैं ही हूँ ।

 

 मुझे मनुष्य नाना प्रकार के तप, दान तथा यज्ञों के अनुष्ठान से नहीं जान सकते । मेरी परम उत्तम भक्ति को छोड़कर और किसी उपाय से मेरा सम्यक ज्ञान नहीं हो सकता ।

 

 मैं ही संपूर्ण पदार्थों के भीतर अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ, सवर्त्र व्याप्त हूँ । मैं ही सबका साक्षी हूँ । किंतु संसार के लोग मुझे इस रूप में नहीं जानते । जिसके भीतर यह सारा प्रपंच विद्यमान है, जो सबका अंतरात्मा, परम पुरुष है वह मैं ही हूँ ।

 

मैं ही इस लोक में धाता और विधाता के नाम से प्रसिद्ध हूँ । मेरे सब ओर मुख हैं । मुनि, संपूर्ण देवता, ब्राह्मण, मनु, इंद्र तथा अन्य प्रख्यात तेजस्वी पुरुष भी मुझे नहीं देखते ।

 

  वेद मुझ परमेश्वर का ही सदा स्तुति करते हैं । ब्राह्मण लोग भाँति-भाँति के वैदिक यज्ञों द्वारा मुझ अग्निस्वरूप परमेश्वर का ही यजन करते हैं ।

 

मैं ही ब्रह्मलोक में पितामह हूँ । उस रूप में सब लोग मुझे ही नमस्कार करते हैं । योगी पुरुष भूतनाथ महेश्वरदेव के रूप में मेरा ही ध्यान करते हैं । मैं ही संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और फल देने वाला हूँ । संपूर्ण देवताओं का शरीर धारण करके मैं सर्वात्मा ही सबकी स्तुति-प्रशंसा का विषय हो रहा हूँ-


अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता चैव फलप्रदः ।

सर्वदेवतनुर्भू‍‌त्वा सर्वात्मा सर्वसंस्तुतः ।।  

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय श्रीहनुमान ।।

 

 

Monday, July 1, 2024

श्रीराम गीता- भाग आठ -उपनिषद सिद्धांत का निरूपण- तीन

 

( भगवान श्रीराम का हनुमानजी को उपदेश )

 

प्रकृति में आसक्ति होने से काल के द्वारा वह अविवेक दृढ हुआ है । काल ही प्राणियों की सृष्टि करता है और काल ही समस्त प्रजा का संहार करता है । सब लोग काल के वश में हैं । काल किसी के वश में नहीं है । वह सनातन काल सबके भीतर रहकर इस संपूर्ण जगत का नियंत्रण करता है । भगवान काल ही प्राण, सर्वग्य एवं परम पुरुष कहे जाते हैं ।

 

 संपूर्ण इंद्रियों से मन श्रेष्ठ है, ऐसा मनीषी पुरुषों का कथन है । मन से परे अहंकार है, अहंकार से परे महततत्व है, महततत्व से परे अव्यक्त है और अव्यक्त से परे पुरुष विराजमान है । पुरुष से परे भगवान प्राण हैं । यह संपूर्ण जगत उन्हीं की रचना है । प्राण से परे व्योम और व्योम से परे अग्निस्वरूप ईश्वर है । वह ईश्वर मैं हूँ ।

 

 मैं ही सर्वत्र व्यापक. शांत और ज्ञान स्वरूप परमेश्वर हूँ । मुझसे श्रेष्ठ कोई स्थावर-जंगम प्राणी नहीं है । जो मुझे जान लेता है वह मुक्त हो जाता है-

 

  सोऽहं सर्वत्रगः शान्तो ज्ञानात्मा परमेश्वरः ।

  नास्ति मत्परमं भूतं मां विज्ञाय विमुच्यते ।।

 

संसार में कोई भी स्थावर-जंगम भूत नित्य नहीं है । एकमात्र मुझ अव्यक्त परमाकाशस्वरूप महेश्वर को छोड़कर सब कुछ अनित्य है । मैं ही  सदा संपूर्ण विश्व की सृष्टि और संहार करता हूँ । माया का अधिपति मायामय देवता मैं काल से संयुक्त हूँ । यह काल मेरे निकट रहकर ही सारे जगत की सृष्टि करता है । अनंतात्मा काल ही इस विश्व को विभिन्न कार्यों में नियुक्त करता है । यह वेद का उपदेश है ।

 


।। जय श्रीराम ।।

।। जय हनुमान ।।


Thursday, June 13, 2024

श्रीराम गीता- भाग सात ( उपनिषद सिद्धांत का निरूपण- दो )

 

   ( भगवान श्रीराम का हनुमानजी को उपदेश )

 

प्रकृति और पुरुष ये दो तत्व कहे गए हैं । उन दोनों में संयोग उत्पन्न करनेवाल परम काल कहा गया है, जो अनादि है । प्रकृति, पुरुष और काल ये तीनों तत्व अनादि और अनंत हैं । मुझ अव्यक्त परमात्मा में ही इनकी स्थिति है । जो इन त्रिविधि तत्वों से अभिन्न तथा इनसे परे भी है वही मेरा अनिर्वचनीय स्वरूप है । यह विद्वान पुरुष जानते हैं ।

 

  मेरा स्वरूपभूत वह परम ब्रह्म ही महत् से लेकर विशेष पर्यन्त संपूर्ण जगत की रचना करता है । जो प्रकृति कही गाई है । वह समस्त देहधारियों को मोह में डालने वाली है ।

 

 पुरुष उस प्रकृति में ही स्थित होकर प्राकृत गुणों का उपभोग करता है ।अहंकार से पृथक होने के कारण वह पचीसवाँ तत्व कहा गया है । प्रकृति का जो विकार है, उसे महान् आत्मा या महत् तत्व कहते हैं, उसी का नाम विज्ञान शक्ति या समिष्टबुद्धि है ।

 

  उस विज्ञान से अहंकार उत्पन्न हुआ है । एक मात्र महान् आत्मा ही अहंकार कहलाता है । तत्वचिंतक विद्वान उसी को जीव तथा अंतरात्मा कहते हैं । उसी के द्वारा प्रत्येक जन्म में प्राणी समस्त सुख-दुःखों का अनुभव करता है । 


  विज्ञानात्मा से युक्त जीव का मन उपकारक होता है । उस विज्ञानात्मा से अपने पार्थक्य का बोध न होने से पुरुष को संसार बंधन की प्राप्ति होती है ।

 

।। जय श्रीराम ।।

Monday, May 20, 2024

श्रीराम गीता- भाग छः - उपनिषद सिद्धांत का निरूपण-एक

   ( भगवान श्रीराम का हनुमानजी को उपदेश )


भगवान श्रीरामचन्द्रजी ने अपने उपदेश को जारि रखते हुए कहा- ‘हनुमन ! अव्यक्त परमात्मा से काल, प्रधान नामक तत्व और परमपुरुष इन तीनों की उत्पत्ति हुई है । इन तीनों से ही यह संपूर्ण जगत उत्पन्न हुआ है इसलिए संपूर्ण जगत मैं ही हूँ ।

 

परब्रह्म परमात्मा के सब ओर हाथ-पैर हैं । उनके नेत्र, मस्तिष्क और मुख भी सब ओर है । उनके कान भी सब ओर है । वे लोक में सबको व्याप्त करके स्थित हैं । वे संपूर्ण इन्द्रियों के गुणों को प्रकाशित करने वाले हैं, तथापि समस्त इन्द्रियों से रहित हैं । वे सबके आधार हैं । उनका आनंद स्थिर है । वे अव्यक्त हैं । उनमें द्वैत का अभाव है । वे संपूर्ण उपमाओं से रहित और प्रमाणों के अगोचर हैं ।

 

  निर्विकल्प, निराभास, सबके प्रकाशक तथा परम अमृत-स्वरूप हैं । उनमें भेद का सर्वथा अभाव है । तथापि वे भिन्न-भिन्न शरीर धारण करते हैं । सनातन, ध्रुव और अविनाशी हैं । वे निर्गुण, परम व्योमस्वरूप तथा ज्ञानमय हैं, विद्वान पुरुष उन्हें इसी रूप में जानते हैं । वे ही संपूर्ण भूतों के आत्मा हैं । वाह्य और आभ्यंतर सभी पदार्थों से परे हैं । वह सर्वत्र व्यापक, शांत स्वरूप ज्ञानात्मा परमेश्वर मैं ही हूँ – ‘सोऽहं सर्वत्रगः शान्तो ज्ञानात्मा परमेश्वरः’

 

  मुझ अव्यक्त स्वरूप परमेश्वर ने इस संपूर्ण विश्व को व्याप्त कर रक्खा है । संपूर्ण भूत मुझमें ही स्थित हैं । इस प्रकार जो मुझ परमात्मा को जानता है, वही वेदवेत्ता है ।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय श्रीहनुमान ।।

 

Thursday, April 11, 2024

श्रीराम गीता-भाग-पाँच- हनुमानजी को सांख्ययोग के उपदेश का अंतिम भाग -सर्वतः पाणिपादोऽहमंतर्यामी सनातनः

( भगवान श्रीराम का हनुमानजी को उपदेश )  

हनुमन ! यह आत्मा मैं ही हूँ । मैं ही अव्यक्त मायाधिपति  परमेश्वर हूँ । मुझे ही संपूर्ण वेदों में सर्वात्मा और सर्वतोमुख कहा गया है । 

    

एष आत्माहमव्यक्तो मायावी परमेश्वरः

कीर्तितः सर्ववेदेषु सर्वात्मा सर्वतोमुखः ।।


संपूर्ण कामनाएँ, संपूर्ण रस तथा संपूर्ण गंध मैं ही हूँ । जरा और मृत्यु मुझे छू नहीं सकते । मेरे सब ओर हाथ और पैर हैं । मैं ही सनातन अन्तर्यामी परमात्मा हूँ-


सर्वकामः सर्वरसः सर्वगंधोऽजरोऽमरः ।

सर्वतः पाणिपादोऽहमंतर्यामी सनातनः ।।

 

मेरे हाथ और पैर नहीं हैं तो भी मैं सब कुछ ग्रहण करता हूँ और वेग से चलता हूँ  । मैं ही सबके ह्रदय में आत्मा रूप से विराजमान हूँ । मैं आँख न होने पर भी देखता और कान के बिना भी सुनता हूँ । मैं इस संपूर्ण जगत को जानता हूँ लेकिन मुझे कोई नहीं जानता ।

 

 तत्वदर्शी पुरुष मुझे एकमात्र महान पुरुष परमात्मा कहते हैं । मेरा स्वरूप निर्गुण और निर्मल है उसका जो परमोत्तम ऐश्वर्य है, उसे देवता भी नहीं जानते । क्योंकि वे भी मेरी माया से मोहित हैं । मेरा जो गुह्यतम सर्वव्यापी तथा अविनाशी, चिन्मय स्वरूप है । उसमें प्रविष्ट होकर तत्वदर्शी योगी मेरा सायुज्य प्राप्त कर लेते हैं ।


जिन लोगों को विश्वरूपिणी माया ने आक्रांत नहीं किया है वे मेरे साथ एकीभूत होकर परम शुद्ध निर्वाण प्राप्त कर लेते हैं । सौ करोड़ा कल्पों में भी वे इस संसार में नहीं आते ।


वत्स मेरी कृपा से तुम्हें यह वेद का उपदेश प्राप्त हुआ है । हनुमन ! जो पुत्र, शिष्य अथवा योगी न हो ऐसे लोगों को कभी इस ज्ञान का उपदेश नहीं देना चाहिए । यह विज्ञान जिसे तुम्हें बताया गया है सांख्ययोग से सम्बद्ध है ।


हनुमान जी को सांख्ययोग का उपदेश भाग -४

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय श्रीहनुमान ।।

Tuesday, April 2, 2024

श्रीराम गीता-भाग चार-हनुमानजी को सांख्ययोग का उपदेश भाग- ४

( भगवान श्रीराम का हनुमानजी को उपदेश )      


ज्ञानस्वरूप परमात्मा में चित्त का एकीभाव से लग जाना योग कहलाता है । योग से ज्ञान होता है और ज्ञान से योग । जो ज्ञान और योग दोनों से सम्पन्न हैं उसके लिए कहीं कुछ भी प्राप्तब्य नहीं है । 


भाग-३ से आगे-

जब साधक के मन में सदा सर्वत्र व्यापक चैतन्य का बिना किसी व्यवधान के प्रकाश हो जाय, तब वह स्वयं परमात्म स्वरूप हो जाता है । जब ज्ञानी पुरुष संपूर्ण भूतों को अपने आत्मा में ही देखने लगता है तथा संपूर्ण भूतों में अपने आत्मा का साक्षात्कार करने लगता है, तब वह स्वयं ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है । जब विद्वान पुरुष संपूर्ण भूतों का अपने आत्मा में  ही दर्शन करता है, तब वह परमात्मा से एकीभूत होकर कैवल्य-अवस्था को प्राप्त हो जाता है ।

 

  जब साधक के ह्रदय में विद्यमान संपूर्ण कामनाएँ छूट जाती हैं, तब हुए विद्वान अमृतस्वरूप होकर कल्याण को प्राप्त होता है । जब साधक संपूर्ण भूतों के पृथक-भाव को एकमात्र परमात्मा के संकल्प के आधार पर स्थित देखता है तथा उस परमात्मा के संकल्प से ही संपूर्ण भूतों का विस्तार देखता है, तब वह ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है । जब वह आत्मा को वस्तुतः एकमात्र-अद्वितीय देखता है और संपूर्ण जगत को माया मात्र मानने लगता है । तब वह परमानंद को प्राप्त होता है । जब जन्म, जरा, दुख एवं व्याधियों की एकमात्र औषधि विशुद्ध ब्रह्म का सम्यक ज्ञान प्राप्त होता है, तब ज्ञानी पुरुष शिवरूप हो जाता है । जैसे लोक में नदियाँ और नद समुद्र में मिलकर उसके साथ एक हो जाते हैं । उसी प्रकार आत्मा निराकार अविनाशी परमात्मा के साथ एकता को प्राप्त हो जाता है ।

 

   इसलिए विज्ञान ही परमार्थ सत्य है । न तो जगत की सृष्टि सत्य है और न इसका संहार । लोक में विज्ञान पर अज्ञान का आवरण पड़ा हुआ है । इसलिए लोग मोह में पड़ जाते हैं । वह ज्ञान निर्मल, सूक्ष्म, निर्विकल्प और अविनाशी है । यह सारा प्रपंच जिसे अज्ञान कहा जाता है मेरे मत में विज्ञान रूप ही है । हनुमन! यह मैंने तुमसे परमोत्तम ज्ञान-सांख्य का वर्णन किया है । यही संपूर्ण वेदांत का सार है ।

 

  इस ज्ञानस्वरूप परमात्मा में चित्त का एकीभाव से लग जाना योग कहलाता है । योग से ज्ञान होता है और ज्ञान से योग । जो ज्ञान और योग दोनों से सम्पन्न हैं उसके लिए कहीं कुछ भी प्राप्तब्य नहीं है । योगी जिस पद को प्राप्त करते हैं सांख्य ज्ञान से भी उसी पद की प्राप्ति होती है । जो सांख्य और योग दोनों को फल की दृष्टि से एक देखता है, वही तत्ववेत्ता है । वत्स ! दूसरे योगीजन अणिमा आदि ऐश्वर्यों में आसक्तचित्त होकर उन्हीं-उन्हीं में दूब जाते हैं । आत्मा की एकता का बोध ही वास्तव में प्राप्य परमपद है । ऐसा श्रुति का कथन है । जो सर्वव्यापी दिव्य महान एवं अचल ऐश्वर्य रूप है, उस ब्रह्मपद को ज्ञान योग सम्पन्न पुरुष देहत्याग के पश्चात प्राप्त कर लेता है ।


श्रीराम गीता के अंतर्गत हनुमानजी को सांख्ययोग का उपदेश भाग-३ 

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय हनुमान ।।       

Sunday, March 24, 2024

श्रीराम गीता -भाग-तीन- हनुमानजी को सांख्ययोग का उपदेश भाग-३

( भगवान श्रीराम का हनुमानजी को उपदेश )

 

संपूर्ण कामनाएँ, संपूर्ण रस तथा संपूर्ण गंध मैं ही हूँ । जरा और मृत्यु मुझे छू नहीं सकते । मेरे सब ओर हाथ और पैर हैं । मैं ही सनातन अन्तर्यामी परमात्मा हूँ-

सर्वकामः सर्वरसः सर्वगंधोऽजरोऽमरः ।

सर्वतः पाणिपादोऽहमंतर्यामी सनातनः ।।

 

भाग-२ से आगे-

मन्त्रद्रष्टा ऋषि निश्चय ही परमात्मा को नित्य एवं सदसत स्वरूप समझते हैं । व्रह्म्वादी महात्मा प्रधान नाम से विख्यात, गुणों की साम्यावस्था रूप प्रकृति को भलीभाँति जानकर उसी को पांचभौतिक जगत का उपादान कारण बताते हैं । यही कारण है कि आत्मा कूटस्थ और निरंजन होने पर भी इस प्रकृति में संगत हो गया है । वह अपने को प्रकृति से अभिन्न मानने लगा है । मैं बस्तुतः अविनाशी ब्रह्म हूँ , ऐसा अपने को नहीं समझता । अतः अनात्म पदार्थ में आत्मबुद्धि करने से ही दुख और सुख होते हैं ।

 

  राग-द्वेष आदि सारे दोष भ्रम के ही कारण इस जीव को कर्तव्य-कर्म में पुण्य और पाप की भावना होती है । ऐसा श्रुति का कथन है । उसी भावना के वशीभूत होकर वह वैसे कर्मों में प्रवृत्त होता है और उन कर्मों के ही फल भोगने के लिए संपूर्ण देहधारियों के समस्त शरीरों की उत्पत्ति होती है । वस्तुतः आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, कूटस्थ, दोषरहित तथा अद्वितीय है । वह मायाशक्ति से ही भेद या नानात्व को प्राप्त होता है , स्वरूप से नहीं । इसलिए ऋषि-मुनियों ने अद्वैत को ही पारमार्थिक सिद्धांत बताया है । भेद अव्यक्त स्वभाव से होता है । वह अव्यक्त स्वभाव आत्मा के आश्रित रहनेवाली माया ही है ।

 

  जैसे धूम के संपर्क से आकाश मलिन नहीं होता है, उसी प्रकार अन्तः करण में उत्पन्न होने वाले रागादि दोषों से आत्मा लिप्त नहीं होता । जैसे विशुद्ध स्फटिक-शिला अपनी प्रभा से सदा एक-सी प्रकाशित होती है, उसी प्रकार उपाधि रहित आत्मा सदा निर्मल रूप से प्रकाशित होता है । विद्वान पुरुष इस जगत को ज्ञान स्वरूप ही बताते हैं, किन्तु दूसरे कुत्सित बुद्धिवाले अज्ञानी लोग इसे अर्थ स्वरूप अर्थात नाना पदार्थ रूप देखते हैं । जो कूटस्थ निर्गुण व्यापक तथा स्वभावतः चैतन्य स्वरूप है, वही परमात्मा भ्रांत दृष्टिवाले पुरुषों को भौतिक पदार्थ के रूप में दृष्टिगोचर होता है । जैसे विशुद्ध स्फटिक रक्तिका के व्यवधान से लोगों को लाल रंग का दिखाई देता है । उसी तरह परम पुरुष परमात्मा माया के व्यवधान से प्रपंचमय देखने लगता है । इसलिए मुमुक्ष पुरुषों को चाहिए कि वे आत्मा को अविनाशी, शुद्ध, नित्य, सर्वव्यापी एवं निर्विकार मानकर उसी रूप में उसका श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन करें ।

रामजी का हनुमानजी को सांख्ययोग का उपदेश भाग-२ 


।। जयश्रीराम ।।

।। जय श्रीहनुमान जी ।।

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