राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।
अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहिं श्रीरघुराई ।।
Showing posts with label भगवान राम का विश्वरूप. Show all posts
Showing posts with label भगवान राम का विश्वरूप. Show all posts

Sunday, December 15, 2024

श्रीराम गीता-भाग १५ – भगवान श्रीराम के सर्वात्मक और सर्वशासक स्वरूप का वर्णन - भाग दो )

  

भगवान राम आगे हनुमानजी से कहते हैं कि महतत्व आदि के क्रम से ही मेरे तेज का विस्तार हुआ है । जो संपूर्ण जगत के साक्षी कालचक्र के प्रवर्तक हिरण्यगर्भस्वरूप  मार्तण्डदेव (सूर्यदेव) हैं, वे भी मेरे ही दिव्य स्वरूप से प्रकट हुए हैं । मैंने उन्हें अपना दिव्य ऐश्वर्य, सनातन योग प्रदान किया है ।

 

कल्प के आदि में मुझसे प्रकट हुए चार वेद मैंने ही ब्रह्माजी को दिए थे । सदा मेरे ही भाव से भावित ब्रह्मा मेरी आज्ञा से सृष्टि करते हैं और मेरे उस दिव्य ऐश्वर्य को सदा वहन करते हैं ।

  सर्वज्ञ ब्रह्मा मेरे आदेश से ही संपूर्ण लोकों के निर्माण में संलग्न हुए हैं । आत्मयोनि ब्रह्मा मेरी ही आज्ञा से चार मुखों वाले होकर सृष्टि रचना करते हैं ।

 

 संपूर्ण लोकों के उद्भव तथा प्रलयस्थान जो अनंत भगवान नारायण हैं, वे भी मेरी ही परम मूर्ति हैं जो जगत के पालन में लगे हैं । जो संपूर्ण विश्व के संहारक भगवान कालरूद्र हैं, वे भी मेरे ही शरीर हैं तथा मेरी ही आज्ञा से सदा संहार कार्य में प्रवृत्त रहते हैं ।

 

  जो हव्यभोजी देवताओं को हव्य पहुँचाते हैं, कव्यभोजी पितरों को कव्य की प्राप्ति कराते हैं तथा अन्न का परिपाक करते रहते हैं वे अग्नि देव भी मेरी शक्ति से प्रेरित हो लोगों के खाये हुए आहार-समूह का दिन-रात पाचन करते हैं ।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय श्रीहनुमान ।।

विशेष पोस्ट

सुन्दरकाण्ड-२७-हनुमानजी की पूँछ में राक्षसों द्वारा आग लगाया जाना

  रावण ने कहा जब यह बानर बिना पूँछ के अपने स्वामी के पास जाएगा तब यह मूर्ख अपने स्वामी को लेकर यहाँ आएगा । जिनकी इसने बहुत बड़ाई किया हैं, मै...

लोकप्रिय पोस्ट

कुछ पुरानी पोस्ट

Labels

hnumanji LNKA pvn अंगदजी अंजना माता अंजना सुवन अंजनानंदवर्धन अद्वितीय अध्ययन अमरावती अयोध्या अशोक वाटिका अशोकवाटिका अशोका वाटिका अश्वनीकुमार असंभव संभव हो जाता है आत्मा आत्मा का विज्ञान आत्मा क्या है आदित्य इन्द्रदेव उपदेश उपनिषद ऋतु ऋष्यमूक पर्वत कपि केसरी कष्ट काकभुसुंडि JII किरात किष्किंधा किष्किन्धा केवट केसरी जी केसरी नंदन केसरीजी केसरीनंदन कोल क्षण गंधमादन पर्वत गरुण जी गीत गुरू गुरू दक्षिणा चौराहा जटायुजी जल जामवंतजी जामवन्तजी जीव ज्ञान त्रिजटा दिवस दीन दीनबंधु देवगण धन धैर्य निमेश पढ़ाई परमात्मा परीक्षा पर्वत पवन देव पवनजी पवनतनय पवनदेव पाठ पार्वती पार्वतीजी पुण्य पूँछ प्रभुता प्रश्न फल बजरंगबली बंदर बल बालाजी ब्रह्मा जी भक्त भक्ति yog भक्ति योग भगवान भगवान राम का विश्वरूप भगवान श्रीराम भालू भील भेद मतंग मुनि मन्वंतर महात्म्य महावीर माया मित्र मुंदरी मुहूर्त मैनाक पर्वत मोक्ष यमदेव युद्ध योग राम राम दूत राम महिमा राम रँगीले रामकाज रामजी रावण राहु माता लंका लंका. भोगावती लंकिनी लक्ष्मणजी लक्ष्मी लोक वक्ता वरदान वानर विद्या विभीषणजी वियोग विराट स्वरूप विश्राम वेद शंकर जी शंकरजी शास्त्र शिक्षा शिव भगवान शिष्य श्रीराम श्रीराम गीता श्रीरामजी श्रीहनुमान श्रोता सचिव सड़क सत्संग की महिमा संदेश सनातन संपातीजी समुद्र समुंद्र सम्पदा सरस्वती संवाद सांख्ययोग सावित्री सिंहिका सीताजी सीताजी की खोज सीतारामजी सुख सुग्रीव जी सुग्रीवजी सुंदरकाण्ड सुन्दरकाण्ड सुमेरु पर्वत सुरसा सूर्य देव सूर्य देव जी सूर्यदेव सेवक सेवक सुखदायक स्तुति स्रोत स्वप्न स्वर्ग स्वामी हनुमान हनुमान जयंती हनुमान जी हनुमानji हनुमानजी हनुमानजी के गुरू