राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।
अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहिं श्रीरघुराई ।।

Sunday, July 5, 2026

सुंदरकाण्ड-२६-हनुमानजी की पूँछ में आग लगाने को रावण का राक्षसों को आदेश देना


 

  हनुमानजी महाराज ने कहा कि हे रावण सुनों मैं प्रतिज्ञा करके अर्थात सर्वथा सत्य कह रहा हूँ कि रामविमुख की रक्षा करने वाला रामजी के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है । एक नहीं हजारों शंकरजी, विष्णुजी और व्रह्मा जी भी रामविमुख की रक्षा नहीं कर सकते ।

तुम बहुत ही पीड़ा देने वाले मोह के मूल अभिमान को छोड़कर करुणा के सागर रघुकुल श्रेष्ठ भगवान श्रीराम का भजन करो ।

यद्यपि हनुमानजी महाराज ने रावण से भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से युक्त बहुत ही हितकर बात कही फिर भी महाभिमानी रावण ने हँसते हुए कहा कि हमें बहुत बड़ा ज्ञानी गुरु यह बानर मिला है ।

फिर रावण ने हुनमान जी से कहा कि हे दुष्ट तेरी मृत्यु निकट आ गई है । नीच तूँ मुझे ज्ञान सिखला रहा है । हनुमानजी महाराज ने कहा कि तुम्हे मति भ्रम हो गया यह मैं प्रगट रूप में जान गया हूँ क्योंकि जो तुम कह रहे हो ठीक उसका उल्टा होने वाला है ।

 

हनुमानजी के बचनों को सुनकर रावण बहुत खिसिया गया और बोला कि इस मूर्ख के प्राण जल्दी ही ले क्यों नहीं लेते । यह सुनकर राक्षस हनुमानजी को मारने दौड़े । इसी समय अपने मंत्रियों के साथ विभीषण जी आ गए ।

 

विभीषण जी ने सिर झुकाकर रावण से बहुत विनती किया और बोले दूत का बध नीति के विरुद्ध है इसलिए इस वानर का बध न किया जाय । आप इसे कोई दूसरा दंड दे सकते हैं । यह सुनकर अन्य लोगों ने भी कहा कि बहुत ही सुंदर बिचार हैं ।

अर्थात इस बानर का बध उचित नहीं है इसे कोई दूसरा दंड देना चाहिए । यह सुनकर रावण हँसते हुए बोला कि इस बंदर का अंग-भंग करके भेज दो । रावण ने आगे सभी को समझाते हुए कहा कि बानर को उसकी पूछ बहुत प्रिय होती है । इसलिए कपड़ा तेल में डुबोकर इसकी पूँछ में बाँध करके आग लगा दो ।

 

 

।। जय श्रीसीताराम ।।

No comments:

Post a Comment

विशेष पोस्ट

सुंदरकाण्ड-२६-हनुमानजी की पूँछ में आग लगाने को रावण का राक्षसों को आदेश देना

    हनुमानजी महाराज ने कहा कि हे रावण सुनों मैं प्रतिज्ञा करके अर्थात सर्वथा सत्य कह रहा हूँ कि रामविमुख की रक्षा करने वाला रामजी के अति...

लोकप्रिय पोस्ट

कुछ पुरानी पोस्ट

Labels

hnumanji LNKA pvn अंगदजी अंजना माता अंजना सुवन अंजनानंदवर्धन अद्वितीय अध्ययन अमरावती अयोध्या अशोक वाटिका अशोकवाटिका अशोका वाटिका अश्वनीकुमार असंभव संभव हो जाता है आत्मा आत्मा का विज्ञान आत्मा क्या है आदित्य इन्द्रदेव उपदेश उपनिषद ऋतु ऋष्यमूक पर्वत कपि केसरी कष्ट काकभुसुंडि JII किरात किष्किंधा किष्किन्धा केवट केसरी जी केसरी नंदन केसरीजी केसरीनंदन कोल क्षण गंधमादन पर्वत गरुण जी गीत गुरू गुरू दक्षिणा चौराहा जटायुजी जल जामवंतजी जामवन्तजी जीव ज्ञान त्रिजटा दिवस दीन दीनबंधु देवगण धन धैर्य निमेश पढ़ाई परमात्मा परीक्षा पर्वत पवन देव पवनजी पवनतनय पवनदेव पाठ पार्वती पार्वतीजी पुण्य पूँछ प्रभुता प्रश्न फल बजरंगबली बंदर बल बालाजी ब्रह्मा जी भक्त भक्ति yog भक्ति योग भगवान भगवान राम का विश्वरूप भगवान श्रीराम भालू भील भेद मतंग मुनि मन्वंतर महात्म्य महावीर माया मित्र मुंदरी मुहूर्त मैनाक पर्वत मोक्ष यमदेव युद्ध योग राम राम दूत राम महिमा राम रँगीले रामकाज रामजी रावण राहु माता लंका लंका. भोगावती लंकिनी लक्ष्मणजी लक्ष्मी लोक वक्ता वरदान वानर विद्या विभीषणजी वियोग विराट स्वरूप विश्राम वेद शंकर जी शंकरजी शास्त्र शिक्षा शिव भगवान शिष्य श्रीराम श्रीराम गीता श्रीरामजी श्रीहनुमान श्रोता सचिव सड़क सत्संग की महिमा संदेश सनातन संपातीजी समुद्र समुंद्र सम्पदा सरस्वती संवाद सांख्ययोग सावित्री सिंहिका सीताजी सीताजी की खोज सीतारामजी सुख सुग्रीव जी सुग्रीवजी सुंदरकाण्ड सुन्दरकाण्ड सुमेरु पर्वत सुरसा सूर्य देव सूर्य देव जी सूर्यदेव सेवक सेवक सुखदायक स्तुति स्रोत स्वप्न स्वर्ग स्वामी हनुमान हनुमान जयंती हनुमान जी हनुमानji हनुमानजी हनुमानजी के गुरू