हनुमानजी महाराज ने कहा कि हे रावण सुनों मैं
प्रतिज्ञा करके अर्थात सर्वथा सत्य कह रहा हूँ कि रामविमुख की रक्षा करने वाला
रामजी के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है । एक नहीं हजारों शंकरजी, विष्णुजी और
व्रह्मा जी भी रामविमुख की रक्षा नहीं कर सकते ।
तुम बहुत ही पीड़ा देने
वाले मोह के मूल अभिमान को छोड़कर करुणा के सागर रघुकुल श्रेष्ठ भगवान श्रीराम का
भजन करो ।
यद्यपि हनुमानजी महाराज
ने रावण से भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से युक्त बहुत ही हितकर बात कही फिर भी
महाभिमानी रावण ने हँसते हुए कहा कि हमें बहुत बड़ा ज्ञानी गुरु यह बानर मिला है ।
फिर रावण ने हुनमान जी से
कहा कि हे दुष्ट तेरी मृत्यु निकट आ गई है । नीच तूँ मुझे ज्ञान सिखला रहा है ।
हनुमानजी महाराज ने कहा कि तुम्हे मति भ्रम हो गया यह मैं प्रगट रूप में जान गया
हूँ क्योंकि जो तुम कह रहे हो ठीक उसका उल्टा होने वाला है ।
हनुमानजी के बचनों को
सुनकर रावण बहुत खिसिया गया और बोला कि इस मूर्ख के प्राण जल्दी ही ले क्यों नहीं
लेते । यह सुनकर राक्षस हनुमानजी को मारने दौड़े । इसी समय अपने मंत्रियों के साथ
विभीषण जी आ गए ।
विभीषण जी ने सिर झुकाकर
रावण से बहुत विनती किया और बोले दूत का बध नीति के विरुद्ध है इसलिए इस वानर का
बध न किया जाय । आप इसे कोई दूसरा दंड दे सकते हैं । यह सुनकर अन्य लोगों ने भी
कहा कि बहुत ही सुंदर बिचार हैं ।
अर्थात इस बानर का बध उचित नहीं है इसे कोई दूसरा दंड देना चाहिए । यह सुनकर रावण हँसते हुए बोला कि इस बंदर का अंग-भंग करके भेज दो । रावण ने आगे सभी को समझाते हुए कहा कि बानर को उसकी पूछ बहुत प्रिय होती है । इसलिए कपड़ा तेल में डुबोकर इसकी पूँछ में बाँध करके आग लगा दो ।
।। जय श्रीसीताराम ।।
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