राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।
अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहिं श्रीरघुराई ।।
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Tuesday, February 10, 2026

सुन्दरकाण्ड-२०-सीताजी से आज्ञा लेकर हनुमानजी का वाटिका में प्रवेश और राक्षसों से युद्ध तथा अक्ष कुमार का वध

 सीताजी से आशिर्बाद पाकर हनुमानजी महाराज ने सीताजी से कहा कि हे माता ! सुनिए- मुझे सुंदर फल से युक्त वृक्षों को देखकर बड़ी भूँख लग गई है । जैसे छोटे बच्चे को खाने-पीने वाली चीज देखकर भूँख लग जाती है और वह अपनी माता से माँगने लग जाता है । ठीक इसी भाव से हनुमान जी को सुंदर-सुंदर फल देखकर भूँख लग गई और उन्होंने माता सीता से निवेदन भी कर दिया ।

 

  माता सीता ने कहा कि हे बेटा ! सुनो इस वन की रखवाली बड़े-बड़े भारी योद्धा राक्षस करते हैं । अर्थात रावण ने इस वाटिका की रक्षा के लिए बड़े-बड़े योद्धाओं को लगा रखा है । हनुमान जी ने कहा के माता यदि आप मन में प्रसन्न होकर आज्ञा दें तो मुझे योद्धाओं का भय नहीं है ।

 

सीता जी ने देखा कि हनुमान जी बल और बुद्धि में निपुण हैं इसलिए कहा कि जाओ और रामजी के चरणों को हृदय में धरकर मधुर फल खाओ । अर्थात राम जी को भोग लगाकर, राम जी को निवेदित करके मधुर-मधुर फल खाइए । 

 

हनुमानजी ने माता सीता के चरणों में शिर नवाकर अर्थात प्रणाम करके वाटिका में प्रवेश किया । और फल खाकर पेड़ों को तोड़ने लगे । वाटिका की रखवारी में बहुत से योद्धा थे । कुछ योद्धाओं को हनुमानजी ने मार दिया और कुछ रावण के पास जाकर पुकारने लगे ।

 

राक्षस योद्धा रावण से बोले कि हे स्वामी ! एक बहुत बड़ा वानर आया है जिसने अशोक वाटिका को उजाड़ दिया है । उसने फल खाएँ हैं और वृक्षों को उखाड़ दिया है । तथा रक्षकों को मसल-मसलकर पृथ्वी पर गिरा दिया है । ऐसा सुनकर रावण ने बहुत सारे योद्धाओं को भेजा । जिन्हें देखकर हनुमानजी महाराज ने गर्जना की । हनुमान जी ने सभी राक्षसों का संहार कर दिया । कुछ अधमरे राक्षस चिल्लाते हुए रावण के पास गए ।

 

फिर रावण ने अपने बेटे अच्छकुमार को भेजा । वह अपने साथ अनेकों श्रेष्ठ योद्धाओं को लेकर चला । उसे आता हुआ देखकर हनुमान जी ने एक वृक्ष को पकड़कर-हाथ में लेकर उसे ललकारा और उसे सहज ही मारकर बड़े जोर से गर्जना की ।

 

अक्ष कुमार के साथ जो योद्धा आए थे उनमें से कुछ को मार डाला, कुछ को मसल डाला और कुछ को पकड़कर धूल में मिला दिया-गाड़ दिया । और कुछ फिर जाकर रावण से बोले कि हे स्वामी वह मर्कट बड़ा ही बलवान है । 

 

                                                      

।। जय श्रीसीताराम ।।

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