हनुमानजी महाराज ने रावण
से कहा कि हे रावण तुम भगवान श्रीराम जी के चरण कमलों को ह्रदय में धारण कर लो और
लंका पर अचल राज्य करो । ऋषि पुलस्त्य का यश निर्मल (कलंक रहित) चन्द्रमा जैसा है ।
और तुम उनके यश रुपी चन्द्रमा में कलंक मत बनो । अर्थात तुमभी रामानुरागी बन जाओ ।
हनुमानजी ने आगे कहा कि तुम मद और मोह को छोड़कर
बिचार करके देखो कि राम नाम के बिना वाणी की शोभा नहीं होती है । अर्थात जब तक मद,
मोह का त्याग नहीं किया जायेगा तब तक राम नाम की महिमा समझ में नहीं आएगी । और
जिह्वा का सदुपयोग नहीं हो पायेगा ।
हनुमानजी ने कहा कि हे
देवताओं के शत्रु रावण श्रेष्ठ स्त्री की शोभा सारे आभूषणों से युक्त होकर भी
वस्त्रहीन होने पर नहीं होती है । अर्थात जिह्वा की शोभा भी बिना राम नाम रुपी
वस्त्र धारण किये नहीं होती है ।
रामविमुख होने से सम्पदा और प्रभुता धीरे-धीरे
चली जाती है । और इनका होना अथवा पाना न होने अथवा न पाने के समान हो जाता है ।
जिन नदियों में स्वयं का जल स्रोत नहीं होता वे बरसात समाप्त होने के बाद
धीरे-धीरे सूख जाती हैं । बरसात के पानी से वे कितने दिन तक जलयुक्त बनी रह पाएँगी
। ठीक इसी प्रकार जिनके पास सम्पदा और प्रभुता का मूल स्रोत नहीं होता उसकी सम्पदा
और प्रभुता भी बरसाती पानी की तरह थोड़े दिन तक ही ठहरती है ।
सम्पदा और प्रभुता का मूल स्रोत तो भगवान श्रीरामजी की कृपा है । और बिना स्रोत के
ऊपरी सम्पदा और प्रभुता कितने दिन ठहरेगी । इसलिए ही हनुमानजी रावण को समझाते हैं
कि तुम रामजी के चरणकमलों को ह्रदय में धारण कर लो बस तुम्हें लंका का अचल राज्य
मिल जाएगा । और तुम्हारी सम्पदा और प्रभुता स्थाई हो जायेगी । अन्यथा यदि तुम राम
बिमुख बने रहोगे तो एक दिन तुम सम्पदा और प्रभुता दोनों से हीन हो जाओगे ।
इसप्रकार सम्पदा, प्रभुता हो अथवा अन्य सुख हों
सबका स्रोत रामजी की कृपा ही है । जिसे रामजी की कृपा मिल जाय उसे फिर सबकुछ मिल
जाता है ।
।। जय श्रीसीताराम ।।