राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।
अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहिं श्रीरघुराई ।।
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Saturday, December 2, 2023

हनुमानजी द्वारा सूर्य देव को गुरू दक्षिणा

 

जैसा पिछले पोस्ट में बताया गया है सूर्य देव अपने रथ में बैठकर चलते रहते थे और हनुमान जी उनके सामने, उनकी ओर मुँह करके उसी वेग से पीठ की तरफ चलते जाते थे और पढ़ते जाते थे । इस प्रकार उदयाचल से अस्ताचल तक चलते हुए हनुमान जी ने सूर्य देव से सारी विद्याएँ सीख लिए ।

 

  इस प्रकार शिक्षा पूर्ण होने पर हनुमानजी सूर्य देव को प्रणाम करके गुरू दक्षिणा माँगने के लिए कहा । यह सनातन और भारत की प्राचीन परंपरा है कि शिक्षा पूर्ण होने पर शिष्य अपने गुरू को दक्षिणा देता है । और गुरू अपने शिष्य के सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा माँगता है ।

 

  सूर्य देव कोई साधारण गुरू तो हैं नहीं । और न ही सूर्य देव को किसी चीज की कमी है । फिर वे गुरू दक्षिणा के रूप में हनुमान जी से क्या लें ? फिर भी हनुमानजी द्वारा विनय पूर्वक आग्रह किए जाने पर सूर्य देव ने कहा कि बेटा हनुमान मेरा पुत्र सुग्रीव किष्किन्धा में रहता है । तुम उसके सचिव बन जाओ । और उसकी सहायता और रक्षा करो ।

 

 हनुमानजी ने सूर्य देव को इस गुरू दक्षिणा के लिए वचन देकर-प्रतिज्ञा करके सूर्य देव को साष्टांग प्रणाम करके और आशीर्वाद पाकर वापस गंधमादन पर्वत पर लौट आए । और अपने माता-पिता को प्रणाम किया । उनकी शिक्षा पूर्ण होने की खुशी में सुंदर उत्सव मनाया गया । और कुछ समय पश्चात हनुमानजी सुग्रीव की सेवा में चले गए ।

 


।। हनुमान जी महाराज की जय ।।

 

 

Friday, November 17, 2023

हनुमानजी की पढ़ाई- भानु से पढ़न हनुमान गए

 

हनुमानजी महाराज थोड़ा और बड़े हुए और इनका यज्ञोपवीत संस्कार हो गया । तब इनके लिए गुरू की आवश्यकता हुई । हनुमान जी महाराज किस आदर्श गुरू के पास विद्या अध्ययन के लिए जाएँ । भुवनभास्कर भगवान सूर्य जो सब शास्त्रों और विद्याओं के ज्ञाता हैं वे हनुमान जी को शिक्षा देने का आश्वासन दे चुके थे ।

                   

  माता अंजना ने कहा बेटा तुम उन्हीं के पास चले जाओ वे ही तुम्हारे योग्य गुरू हैं । माताजी ने हनुमानजी को उनके बल की याद दिलाई और हनुमान जी माता-पिता की आज्ञा से देखते ही देखते सूर्य देव के सामने पहुँच कर उनको प्रणाम करके अपने आने का अभिप्राय भी निवेदन कर दिया ।

 

  सूर्य देव ने सोचा कि ये बाल क्रीड़ा कर रहे हैं । इसलिए वे टालने का प्रयत्न करने लगे । गुरू और शिष्य शिक्षण के समय सामन्यतया आमने सामने बैठकर शिक्षा का आदान प्रदान करते हैं । यही प्राचीन परंपरा है । लेकिन सूर्य देव के पास ठहरने का समय ही नहीं । वे हमेशा चलते ही रहते हैं और वो भी बड़े वेग से । ऐसे में वे शिक्षण का कार्य कैसे कर सकते हैं ? शिक्षण के लिए तो ठहर कर शिक्षा देना चाहिए । सूर्य देव ने सारी परिस्थिति बता दी ।

 

  हनुमानजी बोले कोई बात नहीं है । आप मुझको पढाएं । मैं चलते हुए पढ़ता रहूँगा और प्रश्न भी पूछता रहूँगा । मैं आपके रथ के वेग से चलता रहूँगा । कोई समस्या नहीं आएगी । और न ही क्रम भंग होने पायेगा ।

 

   सूर्यदेव ने कहा पढ़ाई के समय आमने सामने होकर पढ़ना ही उत्तम होता है । इस समस्या का निराकरण कैसे होगा ? हनुमानजी बोले गुरुदेव आप अपने रथ पर बैठकर अपने वेग से चलते रहें । और मैं आपके सामने मुँह करके पीठ पीछे करके उसी वेग से समान दूरी बनाकर चलता रहूँगा ।

 

 सूर्य देव तैयार हो गए । प्रसन्न हो गए । उदयाचल से अस्ताचल तक सूर्यदेव की ओर मुँह करके चलते हुए हनुमानजी बालकों के खेल के समान पढ़ते हुए चलने लगे । हनुमान जी के पढ़ने में न कोई क्रम भंग होता था और न ही कोई भूल होती थी । इस प्रकार चलते हुए हनुमान जी ने व्याकरण, वेद, वेदांग, शास्त्र आदि सारी विद्याओं का अध्ययन कर लिया ।

 

  उस समय का द्रश्य बहुत अनोखा था । लोकपाल, शंकर जी, विष्णुजी, व्रह्मा जी आदि हर कोई हनुमान जी का साहस, उनका वेग, उनकी लगन, उनका धैर्य, उनका बल, उनका दृढ निश्चय आदि देखकर चकित था । सबकी आँखे चौंधिया सी गईं । सब लोगों के चित्त में यही भाव आ रहा था कि क्या स्वयं बल, आथवा स्वयं वीररस, अथवा स्वयं धैर्य, अथवा स्वयं साहस अथवा इन सबके समूह का सार ही साक्षात शरीर धारण करके आ गया है-

भानु सो पढ़न हनुमान गए भानु मन

                 अनुमानि सिसुकेलि कियो फेरफार सो ।

पाछिले पगन गम गगन मगन मन,

                   क्रम को न भ्रम, कपि बालक बिहार सो ।।

कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि

                  लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो ।

बल  कैधों वीररस, धीरज के, साहस कै,

                 तुलसी शरीर धरे सबनि को सार सो ।।

 

 

।। बिद्यार्थी हनुमानजी की जय ।।

Saturday, September 16, 2023

हनुमानजी द्वारा इंद्र, इंद्रवज्र और राहु आदि का मान भंग

 

हनुमानजी पालने में लेटे हुए थे  उन्होंने उगते हुए सूर्य को देखा ।  सूर्यदेव  बहुत ही आकर्षक लग रहे थे । हनुमानजी सूर्य देव की ओर बढ़ चले । हनुमानजी सूर्य के ताप से आहत न हों इसलिए पवन देव वर्फ के समान शीतल होकर हनुमानजी के साथ हो लिए ।

 

  इस दिन अमावस्या की तिथि थी । सूर्यग्रहण का दिन था । हनुमानजी सूर्यदेव के पास पहुँचकर सूर्यदेव को अपने मुख में रख लिया । इधर राहु सूर्य को अपना ग्रास बनाने आ रहा था । उसे कुछ समझ में नहीं आया कि यह कौन और कहाँ से आ गया है । इस धीर बीर बलवान को जन्म किसने दिया होगा ? जब हनुमानजी के आगे उसकी एक न चली तो वह भागकर इंद्र के पास पहुँचा । इधर तीनों लोकों में अँधियारी छा गई थी । किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था –


बाल समय मुख धरेउ तमारी । छाई लोक सकल अँधियारी ।।  

 

 इंद्र राहु की सहायता करने के लिए आए । इंद्र ने हनुमानजी के ऊपर इंद्र वज्र से प्रहार किया । जो हनुमानजी की टोडी से टकराया । जिससे इंद्र के वज्र के दांत टूट गए । इस प्रकार इंद्र, इंद्र वज्र और राहु आदि का मान भंग हो गया-

 

देंह तुम्हारी वज्र समान । तोड्यो इंद्र वज्र का मान ।।  

 

  इंद्र की ऐसी धृष्टता देखकर पवन देव कुपित हो गए । सारे संसार को दुखी देखकर व्रह्मादि सभी देव गण पवनदेव और हनुमानजी की विनती करने लगे । और हनुमानजी को अनेकानेक वरदान देकर मनाने लगे । जिससे हनुमानजी ने सूर्य देव को छोड़ दिया और तीनों लोकों में फिर से उजियारी छा गई । सभी लोग सुखी हो गए-

देवन आनि करी विनती तब छाड़ि दियो रवि कष्ट निवारो ।

- संकटमोचन हनुमानाष्टक ।

विनय सुनत लखि लोक दुखारी । छाड़ेउ रवि फैली उजियारी ।।

- विनयावली ।

 

राहु जो सोच रहा था कि यह कौन और कहाँ से आ गया और इस धीर वीर बलवान को जन्म देने वाली माता कौन है ? उसे अब तक अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था –

 

अंजना को लाल लाल बाल रवि खायो है ।

सोचै मन राहू ऐसो कौन वीर जायो है ।।१।। 

 

रवि बिनु तिहुँपुर घोर तम छायो है ।

सुर मुनि काहू कछु समझ न आयो है ।।२।।

 

एको जब नाहिं चली जाइ गोहरायो है ।

चलेउ सुरेश सब बहु घबरायो है ।।३।।

 

कुलिश को दाँत मान गयो चलायो है ।

टूट्यो नहीं हनु हनुमान जग छायो है ।।४।।

 

सुर सब विधि संग विनय सुनायो है ।

वर देय देय पवन-पूत रिझायो है ।।५।।

 

दीन संतोष फिरि जग सुख छायो है ।

महावीर बलवान अंजना को जायो है ।।६।।

 

।। वज्रांगबली हनुमानजी की जय ।।

 

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