राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।
अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहिं श्रीरघुराई ।।
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Tuesday, February 18, 2025

सुंदरकाण्ड-२-सीताजी की खोज के लिए हनुमानजी का समुद्र के उस पार जाने के लिए प्रस्थान करना – चलेउ हरषि हिय धरि रघुनाथा

    

जामवंत जी के सुंदर बचन हनुमान जी महाराज को बहुत अच्छे लगे । हुनमान जी ने प्रसन्न वदन कहा कि यहाँ आप लोग कंद-मूल फल खाकर कष्ट सहकर भी मेरी तब तक प्रतीक्षा कीजिए जब तक मैं सीताजी का समाचार लेकर न आ जाऊँ । हनुमान जी ने कहा कि मुझे बहुत हर्ष हो रहा है इसलिए काज हो जाएगा । मैं सीता जी का पता लगाने में सफल हो जाऊँगा ।

ऐसा कहकर हनुमान जी ने सभी को प्रणाम करके खुश होकर रघुनाथ जी को हृदय में धारण करके चल दिए ।

समुंद्र के किनारे एक सुंदर पर्वत था । हनुमान जी सहज ही देखते ही देखते उसके ऊपर चढ़ गए । और बार-बार राम जी का सुमिरन करके वहाँ से छलांग लगाई । बलवान हनुमान जी ने इस वेग से उड़ान भरी कि उनके पैर के दबाव से पर्वत तुरंत धँसता हुआ पताल चला गया ।

जिस तरह भगवान राम का वाण अमोघ होता है और चलता है ठीक इसी तरह हनुमान जी महाराज भी चले ।

राम जी के वाण की तरह चलने का मतलब क्या है ? भगवान राम के वाण की कई विशेषता होती है । यह अमोघ होता है । यानी कभी निष्फल नहीं होता । इसका मतलब यह है कि हनुमान जी महाराज भी निष्फल नहीं होंगे । अर्थात वे सीता जी का पता लगा ले जाएँगे । लक्ष्य तक पहुँच जाएँगे ।

  दूसरे राम जी का वाण बहुत ही गतिमान होता है । इसी तरह बड़ी तीव्र गति से हनुमान जी भी चले । अंगद जी कह रहे थे कि मैं चला तो जाऊँगा लेकिन संशय है कि वापस आ पाऊँगा या नहीं । लेकिन राम जी का वाण लक्ष्य वेध कर वापस तर्कस में आ जाता है यह इसकी यानी राम वाण की बड़ी विशेषता होती है । इसी तरह यानी राम वाण की तरह हनुमान जी महाराज वापस आ जाएँगे इसमें कोई संशय नहीं है ।

इस प्रकार परम बलशाली और वेगशाली हनुमानजी ने सीताजी की खोज के लिए समुंद्र को लाँघने के लिए बार-बार भगवान श्रीराम का स्मरण करके उड़ान भरके आकाशमार्ग से लंका की ओर प्रस्थान किया-


बार-बार राम को संभारि रामकाज हेतु रामदूत उड़ि चले ।

बल बुद्धि ज्ञान के निधान अंजना को लाल जैसो कौन मिले ।।

महावीर वेग ते पहाड़, नीर तरु आदि जोर-जोर ते हिले ।

पूरेगी मन आस रामदास खास, देखि देवतन के मन खिले ।।


।। जय हनुमान ।।

Tuesday, February 27, 2024

हनुमानजी का भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी के पास जाना और प्रश्न करना

 

सुग्रीवजी के भेजने पर हनुमानजी महाराज विप्र का भेष बनाकर भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी के पास गए जो सुग्रीव जी से मिलने के लिए ऋष्यमूक पर्वत की ओर आ रहे थे । हनुमानजी थे तो विप्र भेष में लेकिन रामजी और लक्ष्मणजी के अतुलित तेज और अनुपम रूप सौंदर्य को देखकर उन्हें प्रणाम करके पूछने लगे कि श्याम और गौर शरीर वाले आप लोग क्षत्रिय रूप में बन में फिर रहे हैं । हे वीर आप लोग कौन हैं ? यहाँ की भूमि बहुत कठोर है और आप अपने कोमल पदों से इस पर चल रहे हैं । हे स्वामी किस कारण से आप लोग वन में विचरण कर रहे हैं ।

 

  आप लोगों की शरीर मन को हरने वाली, कोमल और सुंदर है । इस पर आप वन के कठिनता से सहे जाने वाली धूप और वायु को सह रहे हैं । क्या आप त्रिदेवों में से कोई हैं । अथवा आप दोनों नर और नारायण हैं ।

 

  हनुमान जी महाराज ने कहा कि क्या आप इस व्रह्मांड के मूल कारण, और जीवों को संसार रुपी सागर से पार उतारने वाले और पृथ्वी का भार नष्ट करने वाले सभी लोकों के स्वामी साक्षात भगवान ही मनुष्य रूप में अवतार ले लिया है । अर्थात वास्तव में आप कौन हैं ?

 

जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार

की तुम्ह अखि भुवन ति लीन्ह मनुज अवतार ।।

 

।। रामदूत हनुमानजी की जय ।।

Tuesday, January 16, 2024

भगवान श्रीराम और लक्ष्मणजी को देखकर सुग्रीव का शंकित होकर हनुमानजी को भेद जानने के लिए भेजना

 

भगवान श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ सीता जी की खोज करते हुए सर, सरिता, गिर आदि को पार करते हुए आगे बढ़ रहे थे । आगे चलने पर दोनों भाई ऋष्यमूक पर्वत के पास पहुँच गए-

   आगे चले बहुरि रघुराया । ऋष्यमूक पर्वत नियराया ।।

 

 इसी ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव जी अपने सचिवों के साथ रहते थे । मतंग मुनि के शाप के कारण बालि ऋष्यमूक पर्वत पर नहीं आ सकता था । फिर भी सुग्रीव जी भयभीत रहते थे । क्योंकि बालि अपने शत्रुओं का पीछा छोड़ता नहीं था । इसलिए सुग्रीव जी को इस बात की चिंता रहती थी कि भले ही बालि स्वयं यहाँ नहीं आ सकता लेकिन किसी दूसरे को भेज कर वध करा सकता है ।

 

  रामजी और लक्ष्मण जी भले ही तपस्वी वेश में थे । लेकिन उनके शरीर से, उनके तेज से  वीरता झलकती थी । और वे धनुष वाण भी धारण किए हुए थे । इसलिए उनको देखकर सुग्रीव के मन में शंका हो गई कि हो न हो ये बालि के भेजे हुए हों । क्योंकि ये वीर भी हैं, इनके धनुष और वाण भी है और ये इसी ओर आ रहे हैं ।

 

   रामजी और लक्ष्मण जी के रूप, तेज और प्रभाव से सुग्रीव जी चकित होकर सोच रहे थे कि इनको युद्ध में जीता नहीं जा सकता है । इसलिए इनका भेद जान लेना चाहिए कि ये कौन हैं, कहाँ से आएँ हैं और इनके यहाँ आने का प्रयोजन क्या है ? यदि ये सही में बालि के द्वारा भेजे हुए हों तो यहाँ से भाग जाना ही उचित है ।

 

 हनुमान जी महाराज धीर, वीर, और बड़े बुद्धिमान हैं । और सुग्रीव जी के विश्वसनीय और प्रिय हैं । इसलिए सुग्रीव जी ने हनुमान जी को रामजी और लक्ष्मण जी का भेद जानने के लिए कहा । और सुग्रीव की शंका तथा उन्हें भयभीत देखकर हनुमानजी रामजी और लक्ष्मण जी का भेद जानने के लिए चल दिए-

   

सिया को खोजत राम लखन जब ऋष्यमूक पर्वत नियराए

देखत बलबीरा दोउ रनधीरा कपि सुग्रीव बहुत घबराए ।।

आवत केहि काजा दो नरराजा सोचत चित कहुँ थित नहि पाए ।

सुनु हनुमाना अति मतिवाना दोउ वर बीर कहाँ ते आए  ।।

देखो तुम जाई कहौ बुझाई, भागौं जो ये बालि पठाए ।

सबको जानैं को नहिं जानै तेहिं जानन चले आप दुराए ।।

 

।। श्रीहनुमानजी महाराज की जय ।।

   

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