राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।
अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहिं श्रीरघुराई ।।

Sunday, August 2, 2026

सुन्दरकाण्ड-२७-हनुमानजी की पूँछ में राक्षसों द्वारा आग लगाया जाना

 

रावण ने कहा जब यह बानर बिना पूँछ के अपने स्वामी के पास जाएगा तब यह मूर्ख अपने स्वामी को लेकर यहाँ आएगा । जिनकी इसने बहुत बड़ाई किया हैं, मैं भी उनकी प्रभुता देखूँ । रावण के बचनों को सुनकर हनुमान जी मन ही मन मुस्कराने लगे । अर्थात आनंदित हुए । शंकरजी कहते हैं कि रावण के ऐसे बचनों को सुनकर मैं जान गया कि सरस्वतीजी सहायक हुई हैं । अर्थात सरस्वतीजी ने रावण की जिह्वा पर बैठकर उससे पूँछ में आग लगाने को कहलवा दिया है ।

                       

  राक्षस रावण के बचनों को सुनकर तेल, कपड़ा आदि इकट्ठा करने में लग गए । हनुमानजी ने लीला किया जिससे उनकी पूँछ बढ़ गई और लंका में कपड़ा, तेल और घी सब समाप्त हो गए । यह तमाशा देखने के लिए लंका नगर निवासी इकट्ठा हो गए और वे हनुमानजी को अपने पैरों से मारकर बहुत हँसी करने लगे ।

 

ढोल बज रहे थे । सभी लोग ताली बजा रहे थे । लंका में हनुमानजी को घुमाकर राक्षसों ने उनकी पूँछ में आग लगा दिया ।

 

।। जय श्रीसीताराम ।।

 

 

 

 

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