रावण ने
कहा जब यह बानर बिना पूँछ के अपने स्वामी के पास जाएगा तब यह मूर्ख अपने स्वामी को
लेकर यहाँ आएगा । जिनकी इसने बहुत बड़ाई किया हैं, मैं भी उनकी प्रभुता देखूँ । रावण
के बचनों को सुनकर हनुमान जी मन ही मन मुस्कराने लगे । अर्थात आनंदित हुए । शंकरजी
कहते हैं कि रावण के ऐसे बचनों को सुनकर मैं जान गया कि सरस्वतीजी सहायक हुई हैं ।
अर्थात सरस्वतीजी ने रावण की जिह्वा पर बैठकर उससे पूँछ में आग लगाने को कहलवा
दिया है ।
राक्षस रावण के बचनों को सुनकर तेल, कपड़ा आदि
इकट्ठा करने में लग गए । हनुमानजी ने लीला किया जिससे उनकी पूँछ बढ़ गई और लंका में
कपड़ा, तेल और घी सब समाप्त हो गए । यह तमाशा देखने के लिए लंका नगर निवासी इकट्ठा
हो गए और वे हनुमानजी को अपने पैरों से मारकर बहुत हँसी करने लगे ।
ढोल बज रहे थे । सभी लोग
ताली बजा रहे थे । लंका में हनुमानजी को घुमाकर राक्षसों ने उनकी पूँछ में आग लगा
दिया ।
।। जय श्रीसीताराम ।।
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