राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।
अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहिं श्रीरघुराई ।।

Wednesday, September 2, 2026

सुन्दरकाण्ड-२७ -लंका दहन

जब हनुमानजी ने देखा कि पूँछ में आग लगा दी गई है तो वे तुरंत बहुत ही सूक्ष्म रूप धारण कर लिए । और राक्षसों के बंधन से निकलकर सोने की अटारियों पर चढ़ गए जिससे राक्षस स्त्रियाँ बहुत ही डर गईं ।

              

  भगवान राम की प्रेरणा से उस समय उनचास तरह की वायु बहने लगी । हनुमानजी ने अट्टहास करके गर्जना किया और वे बढ़कर आकाश को छूने लगे ।

 

  हनुमान जी का शरीर बहुत ही विशाल था । लेकिन शरीर का भार बहुत कम था । उनका शरीर बहुत हल्का था । और वे एक घर से दूसरे घर दौड़कर चढ़ने लगे । लंका नगरी जलने लगी । लोग बेहाल हो गए । आग की अनेकों भयंकर लपटें झपट रहीं थी ।

  हा बाप, हा मैया की पुकार सुनाई पड़ रही है । लोग कहते हैं कि इस अवसर पर हम लोगों की रक्षा कौन करेगा ? कुछ लोग कहने लगे कि हमने तो पहले ही कहा था कि यह बानर नहीं है । कोई देवता बानर पर धारण करके आ गया है ।

 

 लंका ऐसे जल रही थी मानों वह अनाथ की नगरी हो । अर्थात रावण जैसे प्रतापी राजा का भी कोई बश नहीं चल रहा था । यह साधु के अपमान का फल था । राक्षसों ने हनुमानजी का बहुत अपमान किया था । वे उनपर पद-प्रहार कर रहे थे । एक विभीषण के घर को छोड़कर हनुमानजी ने सारे नगर को एक क्षण में जला दिया ।

 शंकरजी कहते हैं कि हनुमानजी उन प्रभु श्रीराम के दूत हैं जिन्होंने अग्नि का निर्माण किया है । ऐसे में अग्नि हनुमानजी को कैसे जला सकता था ? इसलिए हे उमा हनुमानजी नहीं जले । हनुमानजी ने उलट-पलटकर सारी लंका को जला डाला और समुन्द्र के मजधार में कूद पड़े ।

 

समुंद्र में अपनी पूँछ बुझा करके और आराम करके हनुमानजी ने फिर से छोटा सा रूप धारण कर लिया  और जनकसुता माता सीता के सामने हाथ जोड़कर जा खड़े हुए ।


। लंका दहन करने वाले हनुमानजी महाराज की जय 

 

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