राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।
अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहिं श्रीरघुराई ।।
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Sunday, July 5, 2026

सुंदरकाण्ड-२६-हनुमानजी की पूँछ में आग लगाने को रावण का राक्षसों को आदेश देना


 

  हनुमानजी महाराज ने कहा कि हे रावण सुनों मैं प्रतिज्ञा करके अर्थात सर्वथा सत्य कह रहा हूँ कि रामविमुख की रक्षा करने वाला रामजी के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है । एक नहीं हजारों शंकरजी, विष्णुजी और व्रह्मा जी भी रामविमुख की रक्षा नहीं कर सकते ।

तुम बहुत ही पीड़ा देने वाले मोह के मूल अभिमान को छोड़कर करुणा के सागर रघुकुल श्रेष्ठ भगवान श्रीराम का भजन करो ।

यद्यपि हनुमानजी महाराज ने रावण से भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से युक्त बहुत ही हितकर बात कही फिर भी महाभिमानी रावण ने हँसते हुए कहा कि हमें बहुत बड़ा ज्ञानी गुरु यह बानर मिला है ।

फिर रावण ने हुनमान जी से कहा कि हे दुष्ट तेरी मृत्यु निकट आ गई है । नीच तूँ मुझे ज्ञान सिखला रहा है । हनुमानजी महाराज ने कहा कि तुम्हे मति भ्रम हो गया यह मैं प्रगट रूप में जान गया हूँ क्योंकि जो तुम कह रहे हो ठीक उसका उल्टा होने वाला है ।

 

हनुमानजी के बचनों को सुनकर रावण बहुत खिसिया गया और बोला कि इस मूर्ख के प्राण जल्दी ही ले क्यों नहीं लेते । यह सुनकर राक्षस हनुमानजी को मारने दौड़े । इसी समय अपने मंत्रियों के साथ विभीषण जी आ गए ।

 

विभीषण जी ने सिर झुकाकर रावण से बहुत विनती किया और बोले दूत का बध नीति के विरुद्ध है इसलिए इस वानर का बध न किया जाय । आप इसे कोई दूसरा दंड दे सकते हैं । यह सुनकर अन्य लोगों ने भी कहा कि बहुत ही सुंदर बिचार हैं ।

अर्थात इस बानर का बध उचित नहीं है इसे कोई दूसरा दंड देना चाहिए । यह सुनकर रावण हँसते हुए बोला कि इस बंदर का अंग-भंग करके भेज दो । रावण ने आगे सभी को समझाते हुए कहा कि बानर को उसकी पूछ बहुत प्रिय होती है । इसलिए कपड़ा तेल में डुबोकर इसकी पूँछ में बाँध करके आग लगा दो ।

 

 

।। जय श्रीसीताराम ।।

Thursday, April 2, 2026

सुन्दरकाण्ड-23 -हनुमान जी का रावण के अन्य प्रश्नों का उत्तर देना

 हनुमानजी महाराज से रावण ने कहा था कि क्या तुमने अपने कानों से हमारे बारे में नहीं सुना  है ? अर्थात रावण अपनी प्रभुता के बारे में पूछ रहा था कि क्या तुम्हें मेरी प्रभुता के बारे में  पता नहीं है ?

  हनुमानजी महाराज ने कहा कि हे रावण मैं तुम्हारी प्रभुता जानता हूँ । तुम्हारी सहसबाहु से लड़ाई हुई थी । इस लड़ाई में रावण की हार हुई थी । सहसबाहु ने रावण को ऐसे पकड़कर दबोच लिया था जैसे किसीने किसी छोटे प्राणी को सहज ही दबोच लिया हो । हनुमानजी महाराज ने आगे कहा कि बालि से युद्ध करके तुम्हें बहुत यश मिला था । रावण ने बालि से हारने के बाद संधि कर लिया था । हनुमानजी के ऐसे बचनों को सुनकर रावण ने हँसकर अनसुना कर दिया ।

 

हनुमानजी महाराज ने आगे कहा कि मुझे भूँख लगी थी इसलिए मैंने फल खा लिया । हनुमानजी ने कहा कि बंदर के सहज स्वभाव से मैंने वृक्षों को तोड़ा है । अर्थात मैंने जान-बूझ कर ऐसा नहीं किया है यह तो बानरों का सहज स्वभाव है ।

 

रावण ने पूछा था कि तुमने राक्षसों को क्यों मारा ? इसके जबाब में हनुमानजी ने कहा कि सबको देंह प्रिय होती है । लेकिन मुझे मेरे स्वामी परम प्रिय है । और मेरे स्वामी रामजी अपना घर बनाकर मेरी देंह-ह्रदय में रहते हैं । और दुष्ट राक्षस मुझे मार रहे थे-मेरी देंह पर प्रहार कर रहे थे । इसलिए जिसने मुझको मारा मैंने उसे मार डाला । इसपर तुम्हारे पुत्र ने मुझे बाँध लिया । लेकिन मुझे बाँधे जाने पर कोई लज्जा नहीं है । मैं तो अपने स्वामी भगवान राम का कार्य पूरा करना चाहता हूँ ।

  अर्थात भगवान के किसी भी कार्य के लिए लज्जा की कोई बात नहीं होती । जो करना पड़े करना चाहिए यदि  भगवान का कार्य होता हो । इसीप्रकार भजन में भी लज्जा की कोई बात नहीं होती । जैसे भजन बने भजन करना चाहिए । जो भगवान से जोड़े वह जुड़ने योग्य-करने योग्य होता है । जिसमें भगवान की प्रसन्नता हो उसे करना ही चाहिए ।

 

                                              

।। जय श्रीसीताराम ।।

Tuesday, January 20, 2026

सुन्दरकाण्ड भाग-१९-सीताजी का हनुमानजी को आशीर्वाद देना

 

हनुमानजी की वाणी रामजी की भक्ति और प्रताप से तथा तेज और बल से सनी हुई थी । जिसे सुनकर माता सीता के मन में बहुत संतोष हुआ । और हनुमानजी को राम जी का प्रिय जानकर सीताजी ने आशीर्वाद दिया कि हे तात ! आप बल और शील के भंडार हो जाओ ।

         

 सीताजी ने कहा कि हे पुत्र आप अजर और अमर हो जाओ तथा गुणों के भंडार हो जाओ । अर्थात आपको बुढ़ापा और मृत्यु कभी सपर्श न करे (हनुमानजी महाराज को बुढ़ापा स्पर्श नहीं कर सकती, वे हमेशा युवा ही रहते हैं । इसलिए हनुमानजी के युवा स्वरूप का ही पूजन करना चाहिए । और युवा स्वरूप का चित्र आदि घर में रखना चाहिए ) । सीताजी ने आगे कहा कि आप पर रामजी बहुत कृपा करें ।

 

  हनुमानजी महाराज जैसे संत को, भक्त को रामजी की कृपा ही चाहिए होती है । इसलिए बल, शील के भंडार होने का वरदान सुनकर हनुमानजी को ज्यादा प्रसन्नता नहीं हुई । इसी तरह अजर, अमर और गुणनिधि होने का वरदान सुनकर भी ज्यादा प्रसन्नता नहीं हुई ।

 

  लेकिन रामजी आप पर कृपा करें यह वरदान कान से सुनते ही हनुमानजी पूर्ण प्रेम में मग्न हो गए । हनुमानजी ने बार-बार सीताजी को प्रणाम किया-शीश नवाया और हाथ जोड़कर बोले कि हे माता अब मैं कृतार्थ हो गया । आपका आशीर्वाद अमोघ है । अर्थात कभी निष्फल नहीं हो सकता । यह बाद प्रसिद्ध है यानी हर कोई इसे जानता है ।

 

  रामजी बहुत कृपा करें ऐसा अमोघ आशीर्वाद जिसे मिल जाय उसके लिए फिर क्या शेष रह जाता है ? रामजी की कृपा के लिए ही लोग नाना जतन करते हैं । घर छोड़कर विरागी बनते हैं । जप-तप करते हैं । सच में जीवन का अभीष्ट यही है कि रामजी की कृपा हो जाए । जिस पर रामजी की कृपा हो जाती है उसे सभी साधु-सुर-सज्जन की कृपा प्राप्ति हो जाती है । जिस पर रामजी कृपा करते हैं उससे कभी भी मुँह नहीं फेरते ।

 

   जिस पर राम जी की कृपा हो जाती है उस पर राम जी कृपा कभी कम नहीं करते । उत्तरोत्तर उनकी कृपा उस पर बढ़ती ही जाती है-‘जासु कृपा नहि कृपा अघाती’ । ऐसा राम जी का स्वभाव है ।

 

चूँकि राम जी की कृपा ही जीवन का लक्ष्य है । और इसे प्राप्त करने के बाद कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता इसलिए हनुमानजी महाराज को यह आशीर्वाद (तीन आशीर्वादों में से तीसरा-१. बल और शील का भंडार हो जाइए, २. अजर, अमर और गुणनिधि हो जाइए, ३. रामजी आप पर बहुत कृपा करें ) बहुत भाया कि राम जी आप पर बहुत कृपा करें ।

 

। जय श्रीसीताराम 

। जय श्रीहनुमान 

Thursday, January 15, 2026

सुन्दरकाण्ड भाग-१८- सीताजी को हनुमानजी का पर्वताकार रूप दिखाना

 

हनुमानजी महाराज ने कहा कि यदि भगवान श्रीराम को खबर मिल गई होती तो वे देर नहीं करते । अर्थात अब तक राम जी के यहाँ न आने का एक मात्र कारण यह है कि उनको अब तक आपकी खबर ही नहीं लगी कि आप कहाँ हो ? और वे निरंतर आपकी खोज में लगे हैं ।

 

 हनुमानजी महाराज ने कहा कि हे माता जानकी राम वाण रुपी सूर्य के उदित होते ही अधंकार रुपी राक्षसी सेना का पता नहीं चलेगा । अर्थात हे माता जैसे सूर्य के उदित होने से रात्रि का अंधकार समाप्त हो जाता है । ठीक वैसे ही राम जी के वाण रुपी सूर्य से राक्षसों की सेना रुपी अंधकार समाप्त हो जाएगा । 

 

  हनुमानजी महाराज ने कहा कि हे माता मैं आपको अभी अपने साथ लेकर चलता लेकिन रघुनाथ जी की सपथ है, मुझे ऐसी आज्ञा नहीं मिली है । अर्थात राम जी ने ऐसा करने को नहीं कहा है । उन्होंने सिर्फ आपका कुशल समाचार लाने को कहा है, आपको लाने की आज्ञा नहीं दिया है । इसलिए हे माता आप कुछ दिन और धैर्य धारण कीजिए । वानरों के साथ रामजी यहाँ आयेंगे । और राक्षसों को मारकर आपको यहाँ से ले जाएँगे । नारद आदि ऋषि-मुनि रामजी का यश तीनों लोकों में गाएँगे ।

 

सीताजी ने हनुमानजी से कहा कि हे पुत्र सभी वानर तुम्हारे जैसे ही होंगे अर्थात जैसे छोटे आप हो ऐसे ही अन्य वानर भी होंगे । लेकिन राक्षस बड़े बलवान योद्धा हैं । इसलिए मेरे मन में संदेह हो रहा है कि छोटे-छोटे वानर इन बड़े-बड़े बलवान राक्षस योद्धाओं को कैसे जीतेंगे ?

 

ऐसा सुनकर सीताजी को धैर्य और विश्वास दिलाने के लिए हनुमानजी ने अपना शरीर प्रगट किया । हनुमानजी का शरीर सोने के पर्वत के आकार की थी । अर्थात सुमेरु पर्वत जैसे लग रही थी । जो युद्ध में भयंकर दिखने वाली (विपक्षी योद्धाओं में भय उत्पन्न करने वाली ) अत्यंत बल और बीरता से युक्त थी । हनुमान जी के ऐसे रूप को देखकर सीता जी को भरोसा हुआ कि समर क्षेत्र में अवश्मेव वानर राक्षसों पर भारी पड़ेंगे । और तब हनुमानजी ने फिर से वही छोटा सा रूप धारण कर लिया ।

 

हनुमानजी महाराज ने सीताजी से कहा कि हे माता सुनिए वानरों में न ही बहुत बल होता है और न ही उनके बहुत वुद्धि ही होती है । लेकिन रामजी की कृपा से बहुत छोटा सा साँप भी गरुड़ को खा सकता है ।

 

अर्थात यदि रामजी की कृपा हो तो निर्बल और वुद्धिहीन भी बड़ा बलवान और वुद्धिमान बन जाता है । और राम जी के कृपा के बिना बड़ा से बड़ा बलवान और वुद्धिमान भी निर्बल और मूर्ख बन जाता है ।  गरुड़ जी में बड़ा बल है और वे बड़े-बड़े सर्प (जैसे कालिय नाग) को सहज ही मार सकते हैं । लेकिन राम जी के प्रताप से छोटा सा साँप भी गरुड़ को मार सकता है ।

 

अतः हे माता आप अपने मन में किसी भी तरह का संशय न कीजिए । क्योंकि भले ही राक्षस बड़े बलवान और योद्धा हैं और बड़े-बड़े युद्ध जीते भी हैं । यहाँ तक देवताओं को भी जीत लिया है । लेकिन वानरों पर राम जी की कृपा है । इसलिए वानर भले ही बल और वुद्धि हीन समझे जाते हों फिर भी राम जी के प्रताप से हम राक्षसों को परास्त करने में अवश्य ही सफल होंगे ।

 

।। जय श्रीसीताराम ।।

Thursday, December 4, 2025

श्रीसुंदरकाण्ड भाग-१६- सीताजी का हनुमानजी से रामजी और लक्ष्मणजी का कुशल समाचर पूछना

 

जब सीताजी ने जान लिया कि हनुमानजी राम जी के जन यानी भक्त हैं तो हनुमान जी पर सीताजी की गाढ़ी प्रीति हो गई । जब दो सच्चे भक्त मिलते हैं तो दोंनो के बीच ऐसी ही प्रीति हो जाती है । सीताजी के नयन सजल हो गए । और शरीर पुलकित हो गया । जब भक्त आपस में मिलते हैं तो भगवान की चर्चा करते हैं । भगवान के बारे में ही प्रश्न करते और बातचीत करते हैं ।

 

 

 सीता जी ने कहा कि हे हनुमान मैं विरह रुपी सागर में डूब रही थी । लेकिन आप मुझे बचाने के लिए जहाज बनकर आ गए हो । जब भक्त भगवान के विरह में डूब रहा हो तो उसे सत्संग मिल जाय, भगवान की चर्चा करने और सुनने का अवसर मिल जाय तो यही उसके लिए अवलंबन का काम करता है । सीताजी ने कहा कि मैं बलिहारी जा रही हूँ अब लक्ष्मण जी के सहित सुख के भवन राम जी का कुशल समाचार सुनाओ ।

 

 

  राम जी का ह्रदय बहुत ही कोमल है । वे सहज ही कृपा करने वाले हैं । इसके बावजूद भी हे हनुमान बताओ कि उन्होंने निठुरता क्यों धारण कर लिया है । अपने सेवकों को सुख देना यह उनका सहज वाना है । स्वभाव है । क्या कभी राम जी मुझे भी याद करते हैं ?  राम जी अपने सभी भक्तों को याद करते हैं फिर भी देरी देखकर अथवा दुख देखकर कभी-कभी भक्त को ऐसा लगता है कि शायद भगवान ने हमें भुला दिया है । लेकिन भगवान भक्त को कभी नहीं भुलाते । काल और कर्म वश दुख तो सबको स्पर्श करता है । लेकिन भक्त के पास भगवान की कृपा पहले आ जाती है दुख बाद में आता है । दुख प्रत्यक्ष होता है तो वह दिखता है लेकिन कृपा अप्रतक्ष्य होती है इसलिए भक्त कभी-कभी कृपा का आभास नहीं कर पाता अथवा देरी से कर पाता है ।

 

 

सीताजी ने कहा कि हे तात क्या कभी राम जी के श्याम शरीर का दर्शन करके हमारे नयन शीतल होंगे ? अर्थात क्या मुझे रामजी के दर्शन का कभी सौभाग्य मिलेगा ? यह कहते और सोचते ही सीता जी के नयनों में जल भर आया और उनसे कुछ बोला नहीं जा रहा था । सीताजी ने इतना ही कहा कि हे नाथ आपने तो मुझे बिल्कुल ही भुला दिया ।

 

 

सीता जी को इस प्रकार रामजी के विरह में व्याकुल देखकर हनुमानजी बहुत ही कोमल और विन्रम वाणी में बोले कि हे माता रामजी अपने छोटे भाई लक्ष्मण जी के साथ कुशलपूर्वक हैं । सहज कृपा के भंडार रामजी केवल आप के दुख दे ही दुखी हैं । अर्थात उनको जो दुख है वह आप के दुखी होने से है । दूर होने से है । हे माता आप अपने हृदय में किसी तरह का भी संशय न रखें क्योंकि राम जी आपसे दुगुना प्रेम करते हैं ।

 

 

हनुमानजी ने कहा कि हे माता अब हृदय में धैर्य धारण करके रामजी का संदेश सुनिए । ऐसा कहते ही हनुमानजी गदगद हो गए और उनके नयन अश्रुओं से भर गए । हनुमान जी की इस (गदगद) अवस्था में कुछ कहा नहीं जा रहा था तब हनुमान जी के हृदय में स्थित राम जी ने ही सीता जी के वियोग को कहना शुरू किया ।


। जयश्रीराम 

। जयश्रीहनुमान 

 

Thursday, July 10, 2025

सुन्दरकाण्ड-१०-हनुमान जी का लंका में प्रवेश और सीताजी कि खोज करना

 

जब लंकिनी ने हनुमानजी से कहा कि अब आप जिस कार्य के लिए आए हैं उसे भगवान श्रीराम को ह्रदय में धारण करके और लंका में प्रवेश करके पूर्ण कीजिए । तब हनुमान जी महाराज बहुत ही सूक्ष्म रूप बनाकर और राम जी का सुमिरण करके लंका में प्रवेश कर गए ।

 

हनुमानजी ने प्रत्येक मन्दिर में सीता जी को खोजा । उन्हें जहाँ-तहाँ अनेकों योद्धा दिखाई पड़े । इसी क्रम में सीता जी को खोजते हुए हनुमानजी रावण के मन्दिर में गये जो बहुत ही विचित्र थी, जिसका वर्णन नहीं हो सकता । रावण वहाँ सो रहा था और मन्दिर में सीता जी नहीं थीं ।

 

हनुमान जी ने इस प्रकार सभी मंदिरों में जा-जाकर सीता जी को खोजा । हनुमानजी ने लंका के मंदिरों-घरों सभी जगह सीताजी को खोजा लेकिन सीताजी कहीं नहीं मिलीं ।

 

 दरअसल लंका में केवल विभीषण जी ही घर में रहते थे और घर से अलग थोड़ी दूर पर मंदिर था जिसमें विभीषण जी पूजा-पाठ-ध्यान करते थे । लेकिन विभीषण जी भक्त थे तो वे मंदिर को घर कैसे बना लेते ? क्योंकि मंदिर मूलतः भगवान के लिए होता है । इसके विपरीत रावणादि आदि बड़े-बड़े राक्षस मंदिर को ही घर बना लिए थे और उसी में रहते थे । लंका में अधिकांश ढाँचे मंदिरनुमा ही थे । जहाँ पर्वत के उपर रावण का अखाड़ा था । वह महल भी मंदिरनुमा ही था- बैठ जाय तेहिं मंदिर रावन । लागे किंनर गुन गन गावन ।।

 

जब सीता जी का कहीं पता नहीं चला तो हनुमान जी थोड़ा सा सोच में पड़ गए कि अब क्या करूँ ? और राम जी से मन ही मन प्रार्थना करने लगे कि हे राघव ! अब यह कार्य आप पूर्ण करा लीजिए ।

 

 

।। जय श्रीराम ।।

।जय श्रीहनुमान ।।

 

Tuesday, February 18, 2025

सुंदरकाण्ड-२-सीताजी की खोज के लिए हनुमानजी का समुद्र के उस पार जाने के लिए प्रस्थान करना – चलेउ हरषि हिय धरि रघुनाथा

    

जामवंत जी के सुंदर बचन हनुमान जी महाराज को बहुत अच्छे लगे । हुनमान जी ने प्रसन्न वदन कहा कि यहाँ आप लोग कंद-मूल फल खाकर कष्ट सहकर भी मेरी तब तक प्रतीक्षा कीजिए जब तक मैं सीताजी का समाचार लेकर न आ जाऊँ । हनुमान जी ने कहा कि मुझे बहुत हर्ष हो रहा है इसलिए काज हो जाएगा । मैं सीता जी का पता लगाने में सफल हो जाऊँगा ।

ऐसा कहकर हनुमान जी ने सभी को प्रणाम करके खुश होकर रघुनाथ जी को हृदय में धारण करके चल दिए ।

समुंद्र के किनारे एक सुंदर पर्वत था । हनुमान जी सहज ही देखते ही देखते उसके ऊपर चढ़ गए । और बार-बार राम जी का सुमिरन करके वहाँ से छलांग लगाई । बलवान हनुमान जी ने इस वेग से उड़ान भरी कि उनके पैर के दबाव से पर्वत तुरंत धँसता हुआ पताल चला गया ।

जिस तरह भगवान राम का वाण अमोघ होता है और चलता है ठीक इसी तरह हनुमान जी महाराज भी चले ।

राम जी के वाण की तरह चलने का मतलब क्या है ? भगवान राम के वाण की कई विशेषता होती है । यह अमोघ होता है । यानी कभी निष्फल नहीं होता । इसका मतलब यह है कि हनुमान जी महाराज भी निष्फल नहीं होंगे । अर्थात वे सीता जी का पता लगा ले जाएँगे । लक्ष्य तक पहुँच जाएँगे ।

  दूसरे राम जी का वाण बहुत ही गतिमान होता है । इसी तरह बड़ी तीव्र गति से हनुमान जी भी चले । अंगद जी कह रहे थे कि मैं चला तो जाऊँगा लेकिन संशय है कि वापस आ पाऊँगा या नहीं । लेकिन राम जी का वाण लक्ष्य वेध कर वापस तर्कस में आ जाता है यह इसकी यानी राम वाण की बड़ी विशेषता होती है । इसी तरह यानी राम वाण की तरह हनुमान जी महाराज वापस आ जाएँगे इसमें कोई संशय नहीं है ।

इस प्रकार परम बलशाली और वेगशाली हनुमानजी ने सीताजी की खोज के लिए समुंद्र को लाँघने के लिए बार-बार भगवान श्रीराम का स्मरण करके उड़ान भरके आकाशमार्ग से लंका की ओर प्रस्थान किया-


बार-बार राम को संभारि रामकाज हेतु रामदूत उड़ि चले ।

बल बुद्धि ज्ञान के निधान अंजना को लाल जैसो कौन मिले ।।

महावीर वेग ते पहाड़, नीर तरु आदि जोर-जोर ते हिले ।

पूरेगी मन आस रामदास खास, देखि देवतन के मन खिले ।।


।। जय हनुमान ।।

Saturday, February 8, 2025

सुंदरकाण्ड-१ -हनुमानजी के बल का वर्णन-अतुलित बलधामं हेमशैलाभदेहं

हनुमान जी महाराज अतुलित बल के भंडार हैं । यह नहीं कहा जा सकता है कि हनुमान जी में कितना बल है यानी इनके बल को मापा नहीं जा सकता । इनके बल की किसी से तुलना नहीं हो सकती । 


 कहते हैं कि दस हजार हाथी में जितना बल होता है उतना बल एक दिग्गज में और दस हजार दिग्गज में जितना बल होता है उतना बल एक ऐरावत हाथी में होता है । जितना बल दस हजार ऐरावत हाथी में होता है उतना बल एक देवराज इंद्र में होता है । और जितना बल दस हजार देवराज इंद्र में होता है उतना बल हनुमान जी की एक कनिष्ठा ऊँगली में है । 


ऐसे में यही कहा जा सकता है कि हनुमान जी के बल का कोई माप नहीं है और वे अनंत बल के धाम हैं ।

 

   हनुमान जी महाराज के देह की कांति सुमेरु पर्वत की भाँति हैं । अर्थात वे स्वर्ण की सी आभा वाले हैं । और उनकी विराटता भी पर्वत के समान है । राक्षस रुपी वन को जलाने के लिए हनुमान जी महाराज अग्नि के समान हैं । 


ज्ञानियों में हनुमान जी महाराज सबसे श्रेष्ठ हैंसबसे आगे हैं । हनुमान जी महाराज सभी सदगुणों के भंडार है । और वानरों में श्रेष्ठ हैं व उनके प्रमुख है । रामजी के प्रिय हैंभक्त हैंश्रेष्ठ दूत हैं । ऐसे पवनपुत्र हनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूँ ।

 

।। जय हनुमान ।।


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सुन्दरकाण्ड-२७-हनुमानजी की पूँछ में राक्षसों द्वारा आग लगाया जाना

  रावण ने कहा जब यह बानर बिना पूँछ के अपने स्वामी के पास जाएगा तब यह मूर्ख अपने स्वामी को लेकर यहाँ आएगा । जिनकी इसने बहुत बड़ाई किया हैं, मै...

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