राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।
अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहिं श्रीरघुराई ।।
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Sunday, July 5, 2026

सुंदरकाण्ड-२६-हनुमानजी की पूँछ में आग लगाने को रावण का राक्षसों को आदेश देना


 

  हनुमानजी महाराज ने कहा कि हे रावण सुनों मैं प्रतिज्ञा करके अर्थात सर्वथा सत्य कह रहा हूँ कि रामविमुख की रक्षा करने वाला रामजी के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है । एक नहीं हजारों शंकरजी, विष्णुजी और व्रह्मा जी भी रामविमुख की रक्षा नहीं कर सकते ।

तुम बहुत ही पीड़ा देने वाले मोह के मूल अभिमान को छोड़कर करुणा के सागर रघुकुल श्रेष्ठ भगवान श्रीराम का भजन करो ।

यद्यपि हनुमानजी महाराज ने रावण से भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से युक्त बहुत ही हितकर बात कही फिर भी महाभिमानी रावण ने हँसते हुए कहा कि हमें बहुत बड़ा ज्ञानी गुरु यह बानर मिला है ।

फिर रावण ने हुनमान जी से कहा कि हे दुष्ट तेरी मृत्यु निकट आ गई है । नीच तूँ मुझे ज्ञान सिखला रहा है । हनुमानजी महाराज ने कहा कि तुम्हे मति भ्रम हो गया यह मैं प्रगट रूप में जान गया हूँ क्योंकि जो तुम कह रहे हो ठीक उसका उल्टा होने वाला है ।

 

हनुमानजी के बचनों को सुनकर रावण बहुत खिसिया गया और बोला कि इस मूर्ख के प्राण जल्दी ही ले क्यों नहीं लेते । यह सुनकर राक्षस हनुमानजी को मारने दौड़े । इसी समय अपने मंत्रियों के साथ विभीषण जी आ गए ।

 

विभीषण जी ने सिर झुकाकर रावण से बहुत विनती किया और बोले दूत का बध नीति के विरुद्ध है इसलिए इस वानर का बध न किया जाय । आप इसे कोई दूसरा दंड दे सकते हैं । यह सुनकर अन्य लोगों ने भी कहा कि बहुत ही सुंदर बिचार हैं ।

अर्थात इस बानर का बध उचित नहीं है इसे कोई दूसरा दंड देना चाहिए । यह सुनकर रावण हँसते हुए बोला कि इस बंदर का अंग-भंग करके भेज दो । रावण ने आगे सभी को समझाते हुए कहा कि बानर को उसकी पूछ बहुत प्रिय होती है । इसलिए कपड़ा तेल में डुबोकर इसकी पूँछ में बाँध करके आग लगा दो ।

 

 

।। जय श्रीसीताराम ।।

Saturday, February 21, 2026

सुन्दरकाण्ड-२१- हनुमानजी का मेघनाद से युद्ध और बंदी बनकर रावण की सभा में प्रवेश

 अपने पुत्र का वध सुनकर रावण क्रोधित हो उठा । और उसने बलवान मेघनाद को भेजा । रावण ने कहा कि हे पुत्र उसे मारना नहीं । बाँध लाना । देखा जाय वह बंदर कहाँ से आया है  । अर्थात उसके बारे में जाना जाय कि वह कहाँ का है । और क्यों आया है । या उसे किसी ने भेजा है । इंद्र को युद्ध में जीतने वाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला और उसे भाई का वध सुनकर क्रोध हो आया ।

 

  हनुमानजी महाराज ने देखा कि इस बार भयानक योद्धा आया है । तो वे कटकटाकर गर्जे और दौड़े । हनुमान जी ने एक बहुत ही विशाल वृक्ष को उखाड़ लिया । और उसे मेघनाद के रथ पर फेका । मेघनाद का रथ टूट गया । इस प्रकार मेघनाद रथ से बिहीन हो गया । मेघनाद के साथ बड़े-बड़े योद्धा थे । हनुमानजी उन्हें पकड़-पकड़कर अपने शरीर से ही रगड़ना शुरू कर दिया । योद्धाओं को मारकर हनुमानजी मेघनाद से लड़ने लगे । ऐसा लग रहा था कि कोई दो गजराज लड़ रहे हों ।

 

  हनुमानजी ने मेघनाद के ऊपर मुष्टिक का प्रहार करके पेड़ पर चढ़ गए और उसे एक क्षण के लिए मूर्छा आ गई । मूर्छा दूर होने पर मेघनाद ने फिर से बहुत सारी माया दिखाई । लेकिन पवनसुत हनुमानजी उससे जीते नहीं जा रहे थे । अर्थात वह असफल ही हो रहा था । तब उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया । हनुमानजी ने बिचार किया कि इस अस्त्र की अपार महिमा है । यदि मैं इसके वार को नहीं सहूँगा तो इस अस्त्र का निरादर हो जायेगा । इसकी महिमा मिट जायेगी । यह सोचकर हनुमानजी ने उसका वार सह लिया । ब्रह्मास्त्र के लगने पर हनुमानजी मूर्छित होकर गिर गए । और गिरते हुए भी उन्होंने मेघनाद की सेना का संहार किया ।

 

  मेघनाद ने देखा कि हनुमानजी मूर्छित हो गए हैं तब उसने नागपाश से हनुमानजी को बाँधकरले गया ।

  शंकरजी पार्वती माता से कहते हैं कि हे भवानी जिनका नाम जप करके ज्ञानी लोग जन संसार रुपी बंधन को काट कर मुक्त हो जाते हैं । ऐसे भगवान राम के दूत हनुमानजी कहीं बंधन में आ सकते हैं क्या ? अर्थात हनुमानजी को कोई बाँध नहीं सकता । हनुमानजी ने रामजी का कार्य पूरा करने के लिए स्वयं को जान बूझकर बँधा लिया है ।

 

जब राक्षसों ने सुना कि जो बंदर अशोक वाटिका में फल खा रहा था बंदी बना लिया गया है तब वे लोग तमाशा देखने के लिए रावण की सभा में आ गए । हनुमानजी ने रावण की सभा को जाकर देखा । उसकी इतनी प्रभुता थी जिसका कोई वर्णन नहीं हो सकता ।  देवता और दिग्पाल हाथ जोड़कर बहुत ही विनीत भाव से खड़े हुए थे । सभी लोग डरे हुए रावण की भृकुटी की तरफ देख रहे थे । अर्थात कब किसकी ओर रावण भृकुटी टेढ़ी कर दे कोई पता नहीं था । इस प्रकार सब डरे हुए रावण का रुख देख रहे थे ।

 

   रावण का इतना प्रताप देखकर भी हनुमानजी के मन में कोई शंका नहीं हुई । अर्थात कोई भय नहीं हुआ । वे उसकी सभा में इस प्रकार पहुँचे और इस प्रकार खड़े हुए थे जैसे सांपों के झुण्ड में गरुड़जी निडर रहते हैं । अर्थात जिस प्रकार गरुड़ जी को देखकर सांपों को भय होता है । सांप डर जाते हैं । उसी प्रकार हनुमानजी को देखकर उल्टे राक्षसों को भय हुआ । 

                       

।। जय श्रीसीताराम ।।

Thursday, December 4, 2025

श्रीसुंदरकाण्ड भाग-१६- सीताजी का हनुमानजी से रामजी और लक्ष्मणजी का कुशल समाचर पूछना

 

जब सीताजी ने जान लिया कि हनुमानजी राम जी के जन यानी भक्त हैं तो हनुमान जी पर सीताजी की गाढ़ी प्रीति हो गई । जब दो सच्चे भक्त मिलते हैं तो दोंनो के बीच ऐसी ही प्रीति हो जाती है । सीताजी के नयन सजल हो गए । और शरीर पुलकित हो गया । जब भक्त आपस में मिलते हैं तो भगवान की चर्चा करते हैं । भगवान के बारे में ही प्रश्न करते और बातचीत करते हैं ।

 

 

 सीता जी ने कहा कि हे हनुमान मैं विरह रुपी सागर में डूब रही थी । लेकिन आप मुझे बचाने के लिए जहाज बनकर आ गए हो । जब भक्त भगवान के विरह में डूब रहा हो तो उसे सत्संग मिल जाय, भगवान की चर्चा करने और सुनने का अवसर मिल जाय तो यही उसके लिए अवलंबन का काम करता है । सीताजी ने कहा कि मैं बलिहारी जा रही हूँ अब लक्ष्मण जी के सहित सुख के भवन राम जी का कुशल समाचार सुनाओ ।

 

 

  राम जी का ह्रदय बहुत ही कोमल है । वे सहज ही कृपा करने वाले हैं । इसके बावजूद भी हे हनुमान बताओ कि उन्होंने निठुरता क्यों धारण कर लिया है । अपने सेवकों को सुख देना यह उनका सहज वाना है । स्वभाव है । क्या कभी राम जी मुझे भी याद करते हैं ?  राम जी अपने सभी भक्तों को याद करते हैं फिर भी देरी देखकर अथवा दुख देखकर कभी-कभी भक्त को ऐसा लगता है कि शायद भगवान ने हमें भुला दिया है । लेकिन भगवान भक्त को कभी नहीं भुलाते । काल और कर्म वश दुख तो सबको स्पर्श करता है । लेकिन भक्त के पास भगवान की कृपा पहले आ जाती है दुख बाद में आता है । दुख प्रत्यक्ष होता है तो वह दिखता है लेकिन कृपा अप्रतक्ष्य होती है इसलिए भक्त कभी-कभी कृपा का आभास नहीं कर पाता अथवा देरी से कर पाता है ।

 

 

सीताजी ने कहा कि हे तात क्या कभी राम जी के श्याम शरीर का दर्शन करके हमारे नयन शीतल होंगे ? अर्थात क्या मुझे रामजी के दर्शन का कभी सौभाग्य मिलेगा ? यह कहते और सोचते ही सीता जी के नयनों में जल भर आया और उनसे कुछ बोला नहीं जा रहा था । सीताजी ने इतना ही कहा कि हे नाथ आपने तो मुझे बिल्कुल ही भुला दिया ।

 

 

सीता जी को इस प्रकार रामजी के विरह में व्याकुल देखकर हनुमानजी बहुत ही कोमल और विन्रम वाणी में बोले कि हे माता रामजी अपने छोटे भाई लक्ष्मण जी के साथ कुशलपूर्वक हैं । सहज कृपा के भंडार रामजी केवल आप के दुख दे ही दुखी हैं । अर्थात उनको जो दुख है वह आप के दुखी होने से है । दूर होने से है । हे माता आप अपने हृदय में किसी तरह का भी संशय न रखें क्योंकि राम जी आपसे दुगुना प्रेम करते हैं ।

 

 

हनुमानजी ने कहा कि हे माता अब हृदय में धैर्य धारण करके रामजी का संदेश सुनिए । ऐसा कहते ही हनुमानजी गदगद हो गए और उनके नयन अश्रुओं से भर गए । हनुमान जी की इस (गदगद) अवस्था में कुछ कहा नहीं जा रहा था तब हनुमान जी के हृदय में स्थित राम जी ने ही सीता जी के वियोग को कहना शुरू किया ।


। जयश्रीराम 

। जयश्रीहनुमान 

 

Saturday, October 18, 2025

सुन्दरकाण्ड-१४ - त्रिजटा का स्वप्न और हनुमान जी का अशोक वृक्ष से मुँदरी गिरना

 

लंका में त्रिजटा नाम की एक राक्षसी रहती थी । जिसे रावण ने अशोक वाटिका में सीताजी की रखवाली में लगा रखा था । त्रिजटा निपुण बुद्धि वाली थी । और उसे राम जी के चरणों में अनुराग था । उसने सभी राक्षसियों को बुलाकर कहा कि सीता जी की सेवा करके अपना हित साधन कीजिए । क्योंकि मैंने एक सपना देखा है जिसमें एक बानर ने लंका को जला दिया है और सारी राक्षसी सेना का संहार कर दिया है । रावण गधे पर सवार होकर दक्षिण दिशा की ओर जा रहा है और उसकी बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं तथा सिर मुड़ा (केश रहित है ) हुआ है । और लंका का राज्य मानो विभीषण को मिल गया है ।

 

 सारे राज्य में राम जी के विजय का डंका बज रहा है और इसके बाद राम जी ने सीता जी को लंका से वापस अपने पास बुलवा लिया है । मैं जोर से कह रहीं हूँ कि यह सपना कुछ ही दिनों में सत्य हो जाएगा । त्रिजटा के ऐसे बचन सुनकर सारी राक्षसियाँ डर गईं और सीता जी के चरणों में गिर गईं । इसके बाद राक्षसियाँ जहाँ-तहाँ चलीं गईं । और सीता जी अपने मन में चिंतित होकर सोचने लगीं कि नीच राक्षस एक महीना व्यतीत होने पर मुझे मार डालेगा ।

 

 सीता जी त्रिजटा से हाथ जोड़कर बोलीं कि माता आप इस बिपति की घड़ी में मेरी संगिनी हो । लेकिन अब मुझसे दुसहनिये विरह सहा नहीं जाता । इसलिए कोई उपाय कीजिए जिससे मैं अपनी देंह तज सकूँ । माता जी आप काठ ले आइये और चिता बना दीजिए और फिर उसमें आग लगा दीजिए । रावण के काँटे के समान कानों को बीध डालने वाले बचन को कौन सुनें  ? अतः हे बुद्धिमती राम जी के प्रति मेरी प्रीति को सत्य कर दीजिए ।

 

सीताजी के ऐसे बचनों को सुनकर त्रिजटा ने उनका चरण पकड़कर रामजी के प्रताप, बल और यश को सुनाकर समझाया । त्रिजटा ने कहा कि हे सुकुमारी रात में अग्नि नहीं मिलेगी । ऐसा कहकर वह अपने घर को चली गई ।

 

सीता जी कहने लगीं कि बिधाता ही मेरे प्रतिकूल हो गया है ।  इसलिए अग्नि नहीं मिलेगी  और मेरा दुख दूर नहीं होगा । आकाश में प्रगट रूप से (तारो में) अग्नि दिखाई दे रही है । लेकिन पृथ्वी पर कोई भी तारा नहीं आ रहा है । चंद्रमा अग्निमय दिख रहा है लेकिन वह भी मुझे अभागी जानकर अग्नि स्रवावित नहीं कर रहा है । सीता जी अशोक वृक्ष से ही कहने लगीं के अशोक आप ही मेरी विनती सुन लीजिए और मेरा शोक दूर करके अपने नाम को सत्य कर दीजिए । आपके नए कोमल पत्ते अग्नि के समान के हैं (उनमें अग्नि का आभास  हो रहा है) । इसलिए आप मुझे अग्नि दे दीजिए । जिससे मेरी वेदना और न बढ़े । यानी समाप्त हो जाए ।

 

इसप्रकार सीता जी को राम जी के विरह में बहुत आकुल देखकर वह क्षण हनुमान जी महाराज को एक कलप (लगभग चार करोड़ बत्तीस लाख वर्ष) के समान व्यतीत हुआ ।

 

हनुमान जी महाराज ने ह्रदय में बिचारकर, उचित समय जानकर राम जी की मुँदरी गिरा दी । सीता जी ने मुँदरी की चमक को देखकर सोचा कि मानो अशोक वृक्ष ने अंगार दे दिया है । और यह सोचकर हर्षित होकर उसे हाथ में ले लिया ।   

 

  जय श्रीराम   

  जय श्रीहनुमान   

Saturday, September 6, 2025

सुन्दरकाण्ड-१२-हनुमान जी और विभीषण का संवाद और हनुमानजी का अशोकवाटिका के लिए प्रस्थान

 

हनुमान जी ने बिप्र का रूप बनाकर राम-राम कहा और सुनते ही विभीषण जी उठकर दौड़ते हुए आए और प्रणाम करके उनकी कुशल पूछा और कहा कि आप अपनी कथा सुनाइए । विभीषण जी ने कहा कि मेरे ह्रदय में बहुत प्रेम उमड़ रहा है इससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आप या तो भगवान के भक्तों में से कोई हैं अथवा आप दीनों से सहज ही प्रेम करने वाले दीनानुरागी साक्षात भगवान श्रीराम ही हैं जो अपनी ओर से मुझे बड़भागी बनाने के लिए चले आए हो ।

 

विभीषण जी के ऐसा कहने पर हनुमान जी ने अपना नाम बताया और राम जी की कथा सुनाई । भक्त भगवान की ही कथा सुनते-सुनाते हैं, अपनी अथवा किसी और की नहीं । सुनकर और सुनाकर दोंनो लोग के तन और मन पुलकित हो गए और राम जी के गुणों को याद करके आनन्दित हो गए ।

फिर विभीषण जी हनुमान जी से बोले कि हे पवनपुत्र मेरी रहनी सुनिए कि लंका में मैं किस प्रकार रहता हूँ । मैं लंका में ठीक वैसे ही रहता हूँ जैसे बत्तीस दांतों के बीच में जिह्वा रहती है । कब कौन सा दाँत जीभ को काट दे पता नहीं होता । और जीभ दांतों को तो काट नहीं सकती । वह बस चाट सकती है । जब दाँत में दर्द हो अथवा कुछ फस जाय तो जीभ उसे सहलाती रहती है । लेकिन दाँत मौका मिलते ही जीभ को भी चबा लेते हैं ।

हे तात क्या कभी मुझको अनाथ जानकर रघुकुल के नाथ श्रीराम जी मेरे ऊपर कृपा करेंगे । क्योंकि मेरा शरीर तामसी है और मेरे पास कोई भी साधन जैसे पूजा, जप, तप आदि नहीं है । और न ही रामजी के चरण कमलों में प्रेम ही है ।

 फिर विभीषण जी ने कहा कि अब मुझे विश्वास हो गया है कि बिना राम जी की कृपा के साधु जन से मिलना नहीं होता । राम जी ने मेरे ऊपर कृपा की है तभी तो आप अपनी ओर से मुझे दर्शन देने चले आए ।

हनुमान जी ने विभीषण जी को समझाते हुए कहा कि विभीषण जी  राम जी की रीति सुनिए । राम जी सदा अपने सेवक से प्रेम करते हैं । यह उनकी रीति और सेवक से प्रीति है ।  आप अपने मन को छोटा न कीजिए । मेरी ओर देखिए । मैं ही कहाँ बहुत कुलीन हूँ । बानर हूँ । और स्वभाव से ही चंचल हूँ और हर प्रकार से हीन हूँ । मतलब कोई योग्य नहीं हूँ । इतना ही नहीं कोई सुबह नाम भी ले ले तो उसे उस दिन आहार नहीं मिलता । मैं ऐसा अधम हूँ फिर भी मुझ पर भी रघुवीर राम जी की कृपा हुई है । राम जी की कृपा और गुण को याद करके हनुमान जी के आँखों में आँसू भर आए ।

 

वानर और भालुओं को बिकारी समझा जाता है । राम जी से पहले किसी ने बानर-भालुओं से ऐसा प्रेम नहीं किया था । ऐसा सम्मान नहीं दिया था । राम जी ने सबको अपना लिया, मित्र बना लिया, गले से लगा लिया । इसलिए विभीषण जी को समझाते हुए उनको बल देने के लिए हनुमान जी ने ऐसा कहा कि दीनता और हीनता भगवत प्राप्ति में बाधक नहीं हैं । राम जी तो दीन-हीन पर विशेष कृपा करते हैं ।

हनुमान जी ने कहा कि सहज कृपालु ऐसे स्वामी को जो लोग भूल कर संसार में भ्रमते हैं यदि वे दुखी रहें तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है । इस प्रकार राम जी के गुण समूहों को कहते हुए हनुमान जी को अपार-अलौकिक विश्राम-आनंद प्राप्त हुआ ।

फिर विभीषण जी ने सारी कथा कह सुनाई जिस प्रकार से सीता जी  अशोक वाटिका में रह रही थीं । तब हनुमान जी ने कहा कि हे भाई विभीषण अब मैं सीता माता का दर्शन करना चाहता हूँ । विभीषण जी ने सारी युक्ति बताई और हनुमान जी महाराज विभीषण जी से विदा लेकर चल दिए । हनुमान जी महाराज ने फिर से वही छोटा सा आकर बना कर अशोक वन में, जहाँ सीता जी थीं, चले गए ।

 

।। जय श्रीराम ।।

। जय श्रीहनुमान ।।


Monday, August 4, 2025

सुन्दरकाण्ड-११-हनुमान जी का लंका में विभीषणजी से भेंट करने के लिए निश्चय करना

 

हनुमानजी महाराज मन ही मन श्री रघुनाथ जी का ध्यान करके  पं. राधेश्याम जी के शब्दों में निम्न प्रकार से विनती करने लगे -

       

श्रीराम जय राम जय जय राम ।

श्रीराम जय राम जय जय राम ।।

मेरा बल बुद्धि पराक्रम आए तनिक न काम ।

अपने बल से कार्य अब पूर्ण करा लो राम ।।

भटक अँधेरे में रहा स्वामी हो निराश अविराम ।

दो प्रकाश मुझ दास को हे रविकुल रवि राम ।।


  इतना कहते ही उन्हें एक घर दिखाई पड़ा जो बहुत ही सुंदर लग रहा था । और वहाँ अलग से एक हरि मन्दिर बना हुआ था । घर में रामजी के आयुध धनुष और वाण आदि अंकित थे घर की शोभा कही नहीं जा सकती है । नए-नए तुलसी पौधों के समूह थे जिन्हें देखकर हनुमान जी महाराज बहुत ही हर्षित हुए ।


उपरोक्त लक्षण सज्जन के घर के लक्षण थे । लेकिन लंका में तो राक्षसों का ही निवास था । इसलिए यह स्वाभाविक प्रश्न था कि राक्षसों के बीच में सज्जन कैसे रह सकता है । क्या यह सच है अथवा दिखावा है, धोखा है ।

 

  हनुमान जी मन में ऐसा तर्क करने लगे । इसी बीच में विभीषण जी जाग उठे । सुबह का समय था और सज्जन सुबह तड़के ही यानी व्रह्म मुहूर्त में ही जगते हैं । दूसरे सज्जन जगते ही अपने ईष्ट का ध्यान यानी सुमिरण करते हैं । और विभीषण जी भी जगते ही राम-राम कहा जिससे हनुमान जी को हर्ष हुआ और उन्हें निश्चय हो गया कि यह सज्जन है । सज्जन का मतलब भक्त ह्रदय । जो राम जी का है वही सज्जन है ।

  सज्जन व्यक्ति से हर किसी का भला ही होता है । भला न भी हो तो बुरा तो कभी होता ही नहीं । इसलिए हनुमान जी ने सोचा कि इनसे जरूर जान-पहचान करूँगा यानी मिलूँगा क्योंकि सज्जन व्यक्ति से कोई हानि नहीं होती है । यदि वह किसी का कोई काम नहीं बना सकता तो बिगाड़ता भी नहीं ।

 

। जय श्रीराम 

। जय हनुमान 

Tuesday, June 10, 2025

सुन्दरकाण्ड-८- लंकिनी का अपने पुण्य उदय होने की बात कहना और सत्संग की महिमा बताना


हनुमान जी के कोटि के साधु-भक्त के सत्संग की, स्पर्श की बहुत महिमा होती है । हनुमानजी के स्पर्श से लंकिनी के मति के पट खुल गए और बोली हे तात मेरा कोई बहुत बड़ा पुण्य उदय हुआ है जिससे आज मैंने अपनी आँखों से  रामजी के दूत-राम दूत हनुमान  का दर्शन प्राप्त किया है ।

 

लंकिनी बोली हे तात यदि सत्संग के एक क्षण के सुख को तराजू के एक पलड़े पर और तराजू के दूसरे पलड़े पर स्वर्ग और अपबर्ग (मोक्ष) के सारे सुख को रख दिया जाय तो पहला पलड़ा ही भारी होगा । 

 

यहाँ यह ध्यान देना बहुत जरूरी है कि जिसके माध्यम से सत्संग मिल रही है उसका स्तर क्या है ? यदि हनुमानजी महाराज जी की कोटि के संत और भक्त के माध्यम से सत्संगत मिलता है तभी उपरोक्त बातें सत्य होती हैं ।

 

 हनुमानजी महराज के सत्संग से राक्षसी लंकिनी का भी विवेक जागृत हो गया ।  और उसे स्वर्ग और मोक्ष के सुख की अपेक्षा हृदय में कोशलपुर के राजा रामजी को हृदय में धारण करने का सुख श्रेष्ठत लगने लगा । 

 

इसप्रकार कहा जा सकता है कि सत्संग में श्रोता और वक्ता दोनों का स्तर महत्वपूर्ण होता है लेकिन इस घटना से पता चलता है कि वक्ता का स्तर श्रेष्ठ होना ज्यादा जरूरी है । 

 

लंकिनी कहने लगी कि अब आप कौशलपुर के राजा रघुनाथ जी को हृदय में धारण करके लंका में प्रवेश करके सारे कार्य आप पूर्ण कीजिए ।

 

।। महावीर हनुमान जी की जय ।।

  

Tuesday, March 11, 2025

सुन्दरकाण्ड-४-हनुमान जी का सुरसा की परीक्षा में सफल होना- आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान

 

हनुमानजी महाराज मैनाक पर्वत का आदर किया लेकिन उनके सत्कार के प्रस्ताव को अस्वीकार करके आगे बढ़ गए । क्योंकि हनुमानजी महाराज को राम काज किए बिना आदर, सत्कार या विश्राम कुछ भी स्वीकार्य नहीं था । हनुमान जी लंका जा रहे थे । इसलिए देवता लोग थोड़ा बिचलित थे कि क्या होगा ? इसका एक कारण यह था कि लंका दुर्गम नगरी है । इसमें प्रवेश कर पाना ही दुर्गम है । बहुत सुरक्षा है ।  किसी तरह प्रवेश भी हो जाए तो ऐसे बड़े-बड़े राक्षसवीर योद्धा हैं जिनसे कोई पार नहीं पाता । यहाँ साधारण बल और बुद्धि से काम तो चलने वाला नहीं है । यहाँ वही सफल होगा जिसके बास असाधारण बल और बुद्धि होगी ।

 

 क्योंकि यहाँ का राजा रावण हैं जिसके वंदीखाने में लोकपाल तक बंद रहते हैं । सब देव अधिकारी ग्रह आदि जिसके अधिकार में हैं । व्रह्मा जी रोज वेद सुनाने जाते हैं । उनको ऐसा करने के लिए कह रखा हैआदेश दिया है । और शंकर जी भी भय बस रोज पूजन कराने लंका जाते हैं-शंभु सभीत पुजावन जाहीं’ । बड़ी बिडम्बना है जो दूसरों को वेदपुरान कहने-सुनने पर देश निकाला देता हैदंड देता है वह खुद वेद सुनता है । आज भी ऐसे लोग होते हैं जो खुद थोड़ा बहुत पूजा पाठ करते हैं लेकिन बाहर इसकी आलोचना करते हैं ।


खैर उपरोक्त कारणों से देवताओं को थोड़ी चिंता हुई । क्योंकि वे अपने मन को समझा पाने में सफल नहीं हो पा रहे थे कि सीता माता का पता लगाकर सकुशल हनुमान जी वापस आ जाएँगे । इसलिए सर्पों की माता सुरसा से देवताओं ने कहा कि आप हनुमान जी के बल और बुद्धि की परीक्षा लीजिए । जिससे पता चल सके कि वे रामकाज में सफल हो जाएँगे ।

 

  देवताओं के कहने पर सुरसा जी हनुमान जी के मार्ग में आयीं और बोलीं कि देवताओं ने आज मुझे अहार दिया है । इससे मैं अपनी भूँख शांत करूंगी । यह सुनकर पवनपुत्र हनुमान जी ने कहा कि मुझे रामकाज करना है , लंका जाकर सीता माता का पता लगाकर रामजी को समाचार सुनाना है । इतना करके मैं स्वयं आपके मुँह में प्रवेश कर जाऊँगा । हे माता मैं सत्य कहता हूँ । आप मेरा रास्ता मत रोकिये मुझे जाने दीजिए । हनुमान जी ने बहुत प्रयत्न किया , नीति और धर्म युक्त बाते कहीं फिर भी सुरसा टस से मस नहीं हुई तब हनुमान जी बोले कि आप मान ही नहीं रही हैं तो मुझे अपना भोजन बना लीजिए ।

 

 यह सुनकर सुरसा ने एक योजन (आठ मील) तक अपने मुहँ को फैला लिया । तब हनुमान जी महाराज ने दो योजन का अपना आकार बना लिया । यह देखकर सुरसा ने सोलह योजन तक अपने मुँह को विस्तारित कर लिया । तब हनुमान जी ने अपना आकार बत्तीस योजन का कर लिया । इस प्रकार सुरसा अपना मुँह विस्तृत करती रहीं और हनुमाना जी जय श्रीराम बोलकर दुगना आकार बढ़ाते चले गए । कहते हैं कि भगवान राम के नाम में दो अक्षर हैं इसलिए एक बार राम बोलने पर हनुमान जी महाराज सुरसा के मुँह से दुगुने आकार के हो जाते थे ।

 

अंततः सुरसा ने सौ योजन तक अपने मुँह को विस्तारित कर लिया । अब अपनी असाधारण वुद्धि का परिचय देते हुए हनुमान जी बहुत ही सूक्ष्म रूप धारण करके सुरसा के मुँह में प्रवेश कर गए और फौरन वापस भी आ गए । हनुमान जी महाराज इसी बात का वादा भी कर रहे थे कि सीता जी का समाचार राम जी को देकर मैं आपके मुँह में प्रवेश कर जाऊंगा । लेकिन सुरसा ने माना नहीं तो इसलिए आज ही यह काम समपन्न कर दिए ।

 

सुरसा के मुँह से बाहर निकलकर हनुमान जी ने सुरसा जी को प्रणाम करके विदा माँगी कि माता जी अब मुझे जाने दीजिए । सुरसा प्रसन्न होकर बोलीं कि देवताओं ने मुझे जिस काम के लिए भेजा था वह मैंने कर दिया । मुझे आपके बल और बुद्धि का मरम मिल गया है । आप बल और बुद्धि के भंडार हो । आप राम जी के सभी काम को समपन्न कर सकोगे । ऐसा आशीर्वाद देकर सुरसा चली गईं । और हनुमान जी महाराज प्रसन्न होकर आगे चले ।

राम काज सब करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान । 

आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान ।।


।। जय हनुमानजी ।। 

  


 

Saturday, February 1, 2025

सीताजी की खोज के लिए हनुमानजी का समुद्र के उस पार जाने के लिए तैयार होना

 

भगवान श्रीराम की आज्ञा और आशीर्वाद पाकर हनुमानजी महाराज अगंद जी के नेतृत्व में दक्षिण दिशा में जाने वाले वानरों और भालुओं के साथ चल दिए । एक वन से दूसरे वन, नगर, उपवन, गिरि-पर्वत पर अनुसंधान करते हुए अधिक समय बीत गया ।

एक दिन भूँख और प्यास से व्याकुल होकर हनुमानजी को आगे करके देवी स्वयंप्रभा जहाँ तपस्या कर रही थीं उस दुर्गम गुफा में सब प्रवेश कर गए । उनके पूछने पर सबने अपना वृतांत सुनाया और उनकी आज्ञा लेकर स्वादिष्ट फल और जल का पान किया । उस दुर्गम गुफा से बाहर निकलना बड़ा मुश्किल था । देवी ने कहा आप लोग अपनी-अपनी आँखे मूँद लीजिए मैं आप सबको गुफा से बाहर निकलने में सहायता करूँगी ।

   सभी ने अपनी-अपनी आँखे बंद कर लिया और जब आँखे खोलीं तो सबके सब विशाल समुंद्र के किनारे पहुँच चुके थे । देवी वहाँ से किष्किन्धा पर्वत पर भगवान श्रीराम का दर्शन करने चली गईं । भगवान श्रीराम का दर्शन करके देवी ने बड़ी सुंदर स्तुति किया और आशिर्वाद पाकर बद्रीवन में तपस्या करने के लिए चली गईं ।       

अब श्रीसीताजी की खोज में वानर और भालुओं के लिए समुद्र एक बहुत बड़ी बाधा बना हुआ था । वानर-भालू बहुत चिंतित थे कि एक महीने की अवधि भी बीत गई और अब तक सीताजी का कोई समाचार नहीं मिल सका । वानर और भालुओं की आपसी चर्चा को सुनकर संपाती नामक विशाल गीध अपनी गुफा से बाहर आकर वानरों और भालुओं के विशाल समूह को देखा और बड़ा प्रसन्न हुआ । और बोला कि जगदीश्वर ने मेरे लिए भोजन की व्यवस्था किया है । बहुत दिनों से भोजन के बिना भूखें मर रहा था आज एक साथ इतना भोजन मिल गया । गीध की बात सुनकर सभी वानर-भालू बहुत डर गए । तब अंगद जी बोले कि गीधों में जटायु जी महाराज धन्य हैं जिन्होंने रामजी के कार्य हेतु अपना जीवन न्योछावर कर दिया ।

  संपाती जी गीधराज जटायु के भाई थे । गीधराज जटायु का नाम सुनकर संपाती ने वानरों से परिचय पूछा और बोले कि निर्भय होकर पूरी बात बताइए । जटायु जी का वृतांत सुनकर संपाती को बड़ा दुख हुआ और यह सोचकर कि उन्होंने रावण से सीताजी को छुड़ाने के लिए अपने प्राणों का वलिदान किया है और दीनों पर दया करने वाले रामजी ने जटायु जी का अपने पिता के समान अंतेष्टि संस्कार किया है, उन्हें संतोष हुआ । और संपाती ने वानरों के माध्यम से समुंद्र तट पर जाकर जटायु जी को तिलांजलि दिया । उनके नवीन पंख आ गए । उन्होंने ने कहा की गीधों की दृष्टि बहुत दूर तक जाती है, मैं देख पा रहा हूँ समुंद्र के उस पार लंका नगरी के अशोक वाटिका में सीताजी बैठी हुई सोच में पड़ी हैं । आप लोगों में से जो समुंद्र को लांघकर लंका जाएगा वह सीताजी का पता लगाने में सफल होगा ।

 आप लोग राम जी के सेवक हो । राम कार्य के लिए प्रयास करो । अवश्य सफलता मिलेगी । देखिए न मेरा शरीर पहले कैसा था और अब कैसा हो गया है । ऐसा कहकर संपाती जी वहाँ से चले गए ।

   यह सोच का बिषय बना हुआ था कि समुंद्र लाँघ कर लंका कौन जाएगा ? गीधराज संपाती के माध्यम से यह पता चल चुका था कि सीता जी लंका में ही हैं । और लंका तक पहुँचने के लिए समुंद्र पार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है ।

 एक-एक करके वानर और भालु समुंद्र लंघन हेतु अपनी-अपनी असमर्थता जता चुके थे । अगंद जी पार जाने में समर्थ थे लेकिन उन्हें वापस लौटकर आने में संशय था कि वापस आ पाऊँगा कि नहीं । अब अगंद जी के जाने से कोई फायदा नहीं था । क्योंकि यदि पार चले भी जाते और वापस नहीं आ पाते तो सीता जी का कोई समाचार नहीं मिलता और उल्टे एक दूसरी समस्या खड़ी हो जाती । और जामवंत जी वृद्ध थे । ऐसे में कौन पार जाए  ?

 जामवंत जी को अचानक ध्यान आया कि हम लोग नाहक में परेशान हो रहे हैं क्योंकि हम लोंगो के साथ पवनसुत हनुमान जी जो हैं । और ये तो असंभव को भी संभव बना सकते हैं । इस प्रकार सीताजी की खोज में सर्वथा हार जाने के बाद वानरों और भालुओं की एक मात्र आशा हनुमानजी ही बचे थे ।

सीता खोजि भालु कपि हारी । बोले अब बस आस तुम्हारी ।।


  जामवंत जी ने इसलिए हनुमान जी महाराज से कहा कि आप चुप क्यों है ? आप कुछ कह क्यों नहीं रहे हैं । आप बलवान हैं । आप पावन के पुत्र हैं और आपका बल पवन के समान है । आप बुद्धि, ज्ञान और विज्ञान के भंडार हैं । संसार में कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जिसे आप नहीं कर सकते हों । आपके के लिए न ही कुछ कठिन है और न ही दुर्गम है । 

आपका जन्म ही रामजी का काज पूरा  करने के लिए ही हुआ है । जामवंत जी के इतना कहने पर हनुमान जी सुमेरु पर्वत के समान दिखने लगे और सिंह के समान बार-बार गर्जना करके जामवंत जी से बोले कि मैं सहज ही इस खारे समुंद्र को लाँघ जाऊँगा । और सारे रक्षकों सहित रावन को मारकर त्रिकूट पर्वत (जिस पर लंका बसी है ) को उखाड़कर यहाँ ले आऊँगा । आप जैसा उचित समझें मुझसे कहिए कि मैं क्या करूँ । तब जामवंत जी ने कहा कि आप समुंद्र पार करके जाइये और सीता जी से मिलकर और उनका समाचार लेकर आ जाइए फिर राम जी वानर सेना के साथ जाकर रावण का बध करके सीताजी को ले आएँगे और राम जी का सुयश देवता, मुनि और नारद आदि गाएंगे । इस प्रकार हनुमानजी महाराज समुंद्र के पार जाने के लिए उद्दत हो गए ।

 

।। जय श्रीहनुमानजी ।।

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