राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।
अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहिं श्रीरघुराई ।।
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Saturday, February 1, 2025

सीताजी की खोज के लिए हनुमानजी का समुद्र के उस पार जाने के लिए तैयार होना

 

भगवान श्रीराम की आज्ञा और आशीर्वाद पाकर हनुमानजी महाराज अगंद जी के नेतृत्व में दक्षिण दिशा में जाने वाले वानरों और भालुओं के साथ चल दिए । एक वन से दूसरे वन, नगर, उपवन, गिरि-पर्वत पर अनुसंधान करते हुए अधिक समय बीत गया ।

एक दिन भूँख और प्यास से व्याकुल होकर हनुमानजी को आगे करके देवी स्वयंप्रभा जहाँ तपस्या कर रही थीं उस दुर्गम गुफा में सब प्रवेश कर गए । उनके पूछने पर सबने अपना वृतांत सुनाया और उनकी आज्ञा लेकर स्वादिष्ट फल और जल का पान किया । उस दुर्गम गुफा से बाहर निकलना बड़ा मुश्किल था । देवी ने कहा आप लोग अपनी-अपनी आँखे मूँद लीजिए मैं आप सबको गुफा से बाहर निकलने में सहायता करूँगी ।

   सभी ने अपनी-अपनी आँखे बंद कर लिया और जब आँखे खोलीं तो सबके सब विशाल समुंद्र के किनारे पहुँच चुके थे । देवी वहाँ से किष्किन्धा पर्वत पर भगवान श्रीराम का दर्शन करने चली गईं । भगवान श्रीराम का दर्शन करके देवी ने बड़ी सुंदर स्तुति किया और आशिर्वाद पाकर बद्रीवन में तपस्या करने के लिए चली गईं ।       

अब श्रीसीताजी की खोज में वानर और भालुओं के लिए समुद्र एक बहुत बड़ी बाधा बना हुआ था । वानर-भालू बहुत चिंतित थे कि एक महीने की अवधि भी बीत गई और अब तक सीताजी का कोई समाचार नहीं मिल सका । वानर और भालुओं की आपसी चर्चा को सुनकर संपाती नामक विशाल गीध अपनी गुफा से बाहर आकर वानरों और भालुओं के विशाल समूह को देखा और बड़ा प्रसन्न हुआ । और बोला कि जगदीश्वर ने मेरे लिए भोजन की व्यवस्था किया है । बहुत दिनों से भोजन के बिना भूखें मर रहा था आज एक साथ इतना भोजन मिल गया । गीध की बात सुनकर सभी वानर-भालू बहुत डर गए । तब अंगद जी बोले कि गीधों में जटायु जी महाराज धन्य हैं जिन्होंने रामजी के कार्य हेतु अपना जीवन न्योछावर कर दिया ।

  संपाती जी गीधराज जटायु के भाई थे । गीधराज जटायु का नाम सुनकर संपाती ने वानरों से परिचय पूछा और बोले कि निर्भय होकर पूरी बात बताइए । जटायु जी का वृतांत सुनकर संपाती को बड़ा दुख हुआ और यह सोचकर कि उन्होंने रावण से सीताजी को छुड़ाने के लिए अपने प्राणों का वलिदान किया है और दीनों पर दया करने वाले रामजी ने जटायु जी का अपने पिता के समान अंतेष्टि संस्कार किया है, उन्हें संतोष हुआ । और संपाती ने वानरों के माध्यम से समुंद्र तट पर जाकर जटायु जी को तिलांजलि दिया । उनके नवीन पंख आ गए । उन्होंने ने कहा की गीधों की दृष्टि बहुत दूर तक जाती है, मैं देख पा रहा हूँ समुंद्र के उस पार लंका नगरी के अशोक वाटिका में सीताजी बैठी हुई सोच में पड़ी हैं । आप लोगों में से जो समुंद्र को लांघकर लंका जाएगा वह सीताजी का पता लगाने में सफल होगा ।

 आप लोग राम जी के सेवक हो । राम कार्य के लिए प्रयास करो । अवश्य सफलता मिलेगी । देखिए न मेरा शरीर पहले कैसा था और अब कैसा हो गया है । ऐसा कहकर संपाती जी वहाँ से चले गए ।

   यह सोच का बिषय बना हुआ था कि समुंद्र लाँघ कर लंका कौन जाएगा ? गीधराज संपाती के माध्यम से यह पता चल चुका था कि सीता जी लंका में ही हैं । और लंका तक पहुँचने के लिए समुंद्र पार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है ।

 एक-एक करके वानर और भालु समुंद्र लंघन हेतु अपनी-अपनी असमर्थता जता चुके थे । अगंद जी पार जाने में समर्थ थे लेकिन उन्हें वापस लौटकर आने में संशय था कि वापस आ पाऊँगा कि नहीं । अब अगंद जी के जाने से कोई फायदा नहीं था । क्योंकि यदि पार चले भी जाते और वापस नहीं आ पाते तो सीता जी का कोई समाचार नहीं मिलता और उल्टे एक दूसरी समस्या खड़ी हो जाती । और जामवंत जी वृद्ध थे । ऐसे में कौन पार जाए  ?

 जामवंत जी को अचानक ध्यान आया कि हम लोग नाहक में परेशान हो रहे हैं क्योंकि हम लोंगो के साथ पवनसुत हनुमान जी जो हैं । और ये तो असंभव को भी संभव बना सकते हैं । इस प्रकार सीताजी की खोज में सर्वथा हार जाने के बाद वानरों और भालुओं की एक मात्र आशा हनुमानजी ही बचे थे ।

सीता खोजि भालु कपि हारी । बोले अब बस आस तुम्हारी ।।


  जामवंत जी ने इसलिए हनुमान जी महाराज से कहा कि आप चुप क्यों है ? आप कुछ कह क्यों नहीं रहे हैं । आप बलवान हैं । आप पावन के पुत्र हैं और आपका बल पवन के समान है । आप बुद्धि, ज्ञान और विज्ञान के भंडार हैं । संसार में कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जिसे आप नहीं कर सकते हों । आपके के लिए न ही कुछ कठिन है और न ही दुर्गम है । 

आपका जन्म ही रामजी का काज पूरा  करने के लिए ही हुआ है । जामवंत जी के इतना कहने पर हनुमान जी सुमेरु पर्वत के समान दिखने लगे और सिंह के समान बार-बार गर्जना करके जामवंत जी से बोले कि मैं सहज ही इस खारे समुंद्र को लाँघ जाऊँगा । और सारे रक्षकों सहित रावन को मारकर त्रिकूट पर्वत (जिस पर लंका बसी है ) को उखाड़कर यहाँ ले आऊँगा । आप जैसा उचित समझें मुझसे कहिए कि मैं क्या करूँ । तब जामवंत जी ने कहा कि आप समुंद्र पार करके जाइये और सीता जी से मिलकर और उनका समाचार लेकर आ जाइए फिर राम जी वानर सेना के साथ जाकर रावण का बध करके सीताजी को ले आएँगे और राम जी का सुयश देवता, मुनि और नारद आदि गाएंगे । इस प्रकार हनुमानजी महाराज समुंद्र के पार जाने के लिए उद्दत हो गए ।

 

।। जय श्रीहनुमानजी ।।

Sunday, January 26, 2025

रामकाज के लिए हनुमानजी का चयन- जानि काज प्रभु निकट बोलावा

 

भगवान श्रीराम और सुग्रीव जी की मित्रता हो गई । सुग्रीवजी ने सीताजी के आभूषणों को रामजी को दिखाया और रामजी ने आभूषणों को पहिचान कर जान लिया कि ये आभूषण सीताजी के ही हैं । सुग्रीवजी ने कहा कि हे रघुवीर मैं आपकी हर तरह से सेवा करूँगा । जिससे जनकसुता सीता जी आप से मिल जाएँ ।


फिर रामजी ने सुग्रीवजी से वन-पर्वत पर वसने का कारण पूछा, सुग्रीजी ने सारी आपबीती रामजी को सुनाया । सुग्रीवजी रामजी के शरणागत हो चुके थे । रामजी उनके स्वामी और वे रामजी के सेवक बन चुके थे । और रामजी शरणागतवत्सल हैं । भक्तवत्सल हैं । सेवकवत्सल हैं । इसलिए सुग्रीवजी के दुख को सुनकर दीनों पर दया करने वाले आजानुबाहु भगवान राम की विशाल भुजाएँ फड़क उठी ।


  रामजी बोले हे सुग्रीव मैं वानरराज बालि का एक ही वाण से वध कर दूँगा । यदि वह व्रह्मा और रूद्र की शरण में भी चला जाय तो भी उसके प्राण नहीं बचेंगे ।


रामजी ने अपनी प्रतिज्ञानुसार बालि का वध कर दिया और सुग्रीव को किष्किन्धा का राजा बना दिया ।  सुग्रीवजी राजसुख में ऐसे मग्न हो गए कि वर्षाकाल बीत जाने पर भी न रामजी मिले और न ही सीताजी की खोज के लिए जरूरी कदम उठाये । इस पर हनुमानजी उन्हें समझाकर रामकाज के लिए तत्पर होने के लिए चारों दिशाओं से वानर और भालुओं को बुला लाने के लिए दूत भिजवा दिए ।

 

  इधर रामजी की आज्ञा से लक्ष्मणजी सुग्रीवजी को उनकी प्रतिज्ञा को याद दिलाने के लिए किष्किन्धा आए । लक्ष्मणजी को समझा-बुझाकर उनके रोष को शांत किया गया और चारों दिशाओं में दूत भेजे जाने की बात लक्ष्मणजी को बताई गई । फिर हनुमानजी, जामवंतजी अंगदजी आदि को साथ लेकर सुग्रीवजी रामजी से मिलने प्रवर्षण गिरि पर आए ।


सुग्रीवजी ने सिर झुकाकर और हाथ जोड़कर रामजी को प्रणाम किया और बोले हे नाथ मेरा कुछ भी दोष नहीं है । क्योंकि हे देव आपकी माया अत्यंत प्रबल है जो तभी छूटती है जब आप अपनी ओर से जीव पर दया करते हैं ।

 

हे स्वामी देवता, मुनि और मनुष्य सब के सब विषयों के वशीभूत हैं । फिर मेरी क्या बात है क्योंकि मैं तो पामर पशु और पशुओं में भी अत्यंत कामी बंदर हूँ । स्त्री के नयन-वाण जिसको नहीं लगते, जो भयंकर क्रोध रूपी अँधियारी रात में भी जागता रहता है अर्थात जो क्रोधान्ध नहीं होता और जो लोभ की रस्सी से अपने गले को नहीं बाँध रखा है, हे रघुनाथजी वह मनुष्य तो आपके समान हो जाता है । उपरोक्त गुण किसी साधना से नहीं आते । आपकी कृपा से ही किसी-किसी को मिलते हैं । तब रामजी ने मुस्कराकर कहा कि हे भाई सुग्रीव तुम मुझे भरत के समान प्रिय हो । अब मन लगाकर वह उपाय कीजिए जिससे सीता का समाचार मिल सके ।

 

इस प्रकार से बात-चीत हो ही रही थी कि वानरों के यूथ सभी दिशाओं से आ गए । सभी दिशाओं में अनेक रंगों के वानरों के दल दिखाई देने लगे । शंकरजी रामजी की कथा सुनाते हुए पार्वती जी से कहते हैं कि हे उमा मैंने वानरों की सेना को देखा था । यदि कोई उनकी गणना करना चाहे तो वह मूर्ख ही कहा जाएगा । क्योंकि असंख्य वानर थे । सब आकर रामजी के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम करते थे और रामजी के मुखमंडल की रूप-माधुरी को देखकर सब कृतार्थ होते थे । रामजी की सेवा करने का अवसर पाकर और यह सोचकर कि हम राम जी के सेवक और ये हम लोगों के नाथ हैं, सब सनाथ हो गए ।

 

पूरी सेना में एक भी वानर-भालू ऐसा नहीं था जिसकी कुशल-क्षेम राम जी ने न पूछा हो । शंकरजी कहते हैं ऐसा करना रामजी के लिए कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि रामजी विश्वरूप और व्यापक हैं ।

 

सारे वानर और भालू आज्ञा पाकर जहाँ-तहाँ खड़े हो गए और सुग्रीवजी उनको समझाकर बताने लगे कि रामजी के कार्य को करने के लिए और मेरे लिए हे वानरों आप चारों दिशाओं में जाओ । सभी वानर और भालू रामकाज के लिए तैयार थे ।

 

  उनका चार दल बना दिया गया । और एक महीने की समय सीमा तय की गई । एक महीने के भीतर उन्हें सीताजी का समाचार लेकर वापस आना था । दक्षिण दिशा को छोड़कर शेष दिशाओं में वानर दल सीताजी की खोज करने चले गए ।


और अब कमलनयन, रघुकुलतिलक, दीनबंधु, असरन-सरन, असहाय-सहायक, भक्तवत्सल भगवान श्रीराम के श्रीचरणों में प्रणाम करके चौथे दल के रीछ और वानर जगद्जननी भगवती सीता की खोज में दक्षिण दिशा की ओर पयान कर रहे थे ।


 जिनके हनु से टकराकर देवराज इंद्र के सबसे प्रभावी अस्त्र इंद्र-बज्र के दांत टूट गए थे । जिन्होंने एक छलांग में पृथ्वी से सूर्य की दूरी तय करके बचपन में ही सूर्य को फल समझकर अपने मुँह में रख लिया था । जिन्होंने अखिल भुवन प्रकाशक गतिशील श्रीसूर्य देव से उनकी ओर मुख करके पीछे चलते हुए सारी विद्याएँ सहज ही सीख लिया था । जो वानराकार विग्रह में स्वयं भगवान शूलपाणि ही थे । ऐसे पवनतनय, अंजनीपुत्र, केसरीनंदन, परमसंत, श्रीहनुमानजी महाराज सबसे पीछे थे ।

 

  जब हनुमान जी महाराज करुणानिधान भगवान श्रीराम के श्रीचरणों में प्रणाम करके चलने वाले थे तब रघुनाथ जी ने इन्हें योग्य जानकर अपने पास बुला लिया-पाछे पवनतनय सिर नावा जानि काज प्रभु निकट बोलावा ।। उस भारी भीड़ में से राम जी ने राम काज हेतु हनुमान जी का वरण कर लिया- 'महावीर बिदित बरायो रघुवीर को' । जीवों पर भगवान की कृपा होती है । और भक्तों पर विशेष कृपा होती है । हनुमान जी पर राम जी की पहले से ही कृपा थी । लेकिन आज की बात कुछ और थी । आज रघुनाथ जी की हनुमान जी पर बहुत बड़ी कृपा हुई थी ।

 

 रघुनाथ जी सब कुछ जानने वाले हैं । सब कुछ करने वाले हैं । उनके सारे काज तो स्वयं सिद्ध हैं । फिर भी दासों को बड़ाई देना उनका स्वभाव है । करते सब स्वयं हैं लेकिन उसका श्रेय दूसरों को देते हैं । जिसको बड़ाई देना होता है, मान देना होता है उसे माध्यम बनाकर कार्य करा देते हैं । और फिर उसका यशोगान होने लगता है ।

 

   कृपामय राम जी ने हनुमान जी को पास बुलाया और अपना भक्त जानकर उनके सिर पर हाथ फेरा । राम नाम अंकित अपनी अगूंठी हनुमान जी को दिया और कहा कि सीता जी को यह अगूंठी देना । इससे उन्हें विश्वास हो जाएगा कि आपको मैंने ही भेजा है । उन्हें भलीभाँति समझाकर और जतला कर कि उन्हें शीघ्र ही मुक्त करा लिया जाएगा आप शीघ्र ही लौट आना ।


हनुमान जी महाराज प्रसन्न वदन हृदय में करुणानिधान राम जी को धारण करके राम जी को सुमिरते हुए चल पड़े । हनुमान जी मन ही मन सोचते हुए जा रहे थे कि जन्म लेना आज सार्थक हो गया । जिसे राम जी की कृपा मिल जाय, जिसे स्वयं राम जी ने भक्त मान लिया हो, जिसे राम जी ने राम-काज के लिए चुन लिया हो उससे बड़ा बड़भागी और कौन हो सकता है ?


।। जय श्रीराम ।। 

।। जय श्रीहनुमान ।।


Tuesday, January 21, 2025

हनुमानजी का सुग्रीवजी और भगवान श्रीराम की मित्रता कराना

 

जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि हनुमान जी के इस प्रश्न के उत्तर में कि ‘आप कौन हैं’ पहले भगवान श्रीराम ने अपने सर्वात्मक, सर्वेश्वर और सर्वशासक स्वरूप का परिचय दिया-

निर्गुण सगुण उभयात्मक रूपा । कहन लगे प्रभु आप स्वरूपा ।।

सर्वात्मक सर्वेश्वर रामा । सर्वशासक परात्पर परधामा ।।

 

इसके बाद लीला की दृष्टि से अपना लीलापरक परिचय दिया

कोशलेस दशरथ के जाए । हम पितु बचन मानि वन आए ।।

फिर अपने आराध्य श्रीराम को पहचानकर हनुमानजी ने रामजी की बड़ी सुंदर स्तुति किया । और रामजी अपने विराट रूप से लीला रूप में आ गए और बोले हनुमान अब तुम ऐसा करो जैसे सीता की खोज हो सके ।

 

   यह सुनकर हनुमानजी ने थोड़ी देर के लिए सोचा कि रामजी कैसी लीला कर रहे हैं सर्वात्मक, सर्वशासक और सर्वेश्वर होकर सीता जी की खोज हो सके ऐसा करने को कह रहे हैं । फिर प्रभु की इच्छा और लीला को ध्यान में रखकर हनुमानजी बोले कि हे स्वामी वानरराज सुग्रीव इसी पर्वत पर रहते हैं । वे आपके दास हैं । आप उनसे मित्रता कर लीजिए । और उन्हें दीन जानकर निर्भय कर दीजिए । वे माता सीता की खोज कराने हेतु सब ओर अनेकों बंदरों को भेंजेगे । इस प्रकार सीताजी की खोज हो संपूर्ण हो जायेगी ।

 

   ऐसा कहकर रामजी और लक्ष्मणजी को अपनी पीठ पर बैठाकर उड़ चले । जब सुग्रीव जी ने रामजी को देखा तो उन्हें लगा आज निश्चय ही मेरा जन्म अत्यंत सार्थक हो गया ।

 सुग्रीव जी ने सिर झुकाकर राम जी को प्रणाम किया । और रामजी और लक्ष्मण जी ने सुग्रीव जी को गले लगा लिया । रामजी के स्वरूप, रामजी के तेज और रामजी के प्रभाव को देखकर सुग्रीवजी मन ही मन सोचने लगे कि हे विधाता क्या सचमुच ही ये मुझसे मित्रता करेंगे ।

 

  हनुमानजी ने दोनों ओर की सब कथा सुनाकर और अग्नि देव को साक्षी बनाकर प्रतिज्ञा पूर्वक रामजी और सुग्रीवजी की दृढ मित्रता करवा दिया ।

 

 इस प्रकार केवट और कोल-भीलों और किरातों को मित्र बनाने वाले रामजी ने वानर और भालुओं को भी अपना मित्र बना लिया । इन दीन हीनों से मित्रता करके राम जी को बहुत सुख प्राप्त हुआ और रामजी इसमें गौरव का अनुभव करते हैं –

केवट मीत कहे सुख मानत वानर बंधु बड़ाई ।।

 

साधरण लोग सामान्यतया दीन-हीनों से मित्रता नहीं करते । इनसे मित्रता करने से बचते हैं । किसी कारण से किसी से कर भी लें तो इसमें अपना गौरव नहीं समझते । लेकिन धन्य हैं दीन-हीनों के स्वामी रघुनाथजी जो केवल अकेले ऐसे हैं जिन्होंने खोज-खोज कर दीन हीनों को अपनाया है और उन्हें अपना मित्र बनाया है । रामजी की इस सहजता, इस सरलता पर गोस्वामीजी बिक गए । बार-बार कहते हैं कि ‘कौन ईश किए कीस भालु खास माहली’ ।।

 

 

।। जय श्रीराम ।।

Sunday, October 1, 2023

क्या हनुमानजी बंदर थे- कस रे सठ हनुमान कपि

भगवान श्रीराम की सेवा करने के लिए व्रह्मा जी की आज्ञा से देवता लोग धरती पर वनचर देंह धारण करके आ गए- “वनचर देंह धरी छिति माही” । इस प्रकार हनुमान जी वनचर थे । कुछ लोग मूर्खता बस ऐसा कहते हैं कि हनुमान जी और रामजी की सेना के अन्य बानरों के पूँछ नहीं थी । क्योंकि वे बंदर नहीं थे । लेकिन ऐसा कहना, समझना, मानना और प्रचारित करना सही नहीं है बल्कि मूर्खता है ।

 

अंगदजी जब दूत बनकर लंका में रावण की सभा में गए तब अंगद जी ने रावण से पूछा- ‘कस रे सठ हनुमान कपि’ अर्थात अरे मूर्ख क्या हनुमान जी बंदर हैं ? इस प्रश्न को पूछने का मतलब यह नहीं है कि हनुमान जी बंदर नहीं है । इसका वास्तविक मतलब है कि रे मूर्ख क्या हनुमानजी साधारण बंदर हैं ? इस प्रकार हनुमान जी साधारण बंदर नहीं हैं । जैसे नदियों में गंगाजी साधारण नदी नहीं हैं 

 

  इसी तरह रामजी की सेना के सभी बंदर और भालू साधारण बंदर और भालू नहीं थे ।  लेकिन उनका आकार बंदर और भालू का ही था । और इसलिए उनके पूंछ भी थी ।

 

रामजी की सेना के बानरों और भालुओं का आकार बहुत बड़ा था, उनमें बल बहुत था तथा वे वानर और भालू के रूप में देवता थे । आजकल जैसे वानर और भालू हम लोग देखते हैं छोटे-छोटे वे सब इस तरह छोटे नहीं थे । लेकिन थे बंदर और भालू के ही रूप में ।

 अतः इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि रामजी की सेना के बंदरों और भालुओं में पूँछ थी अथवा नहीं थी । उन सबके पूँछ थी । इस प्रकार हनुमानजी के भी पूँछ थी । इतनी बात सत्य है कि वे सब साधरण बंदर और भालू नहीं थे । विशिष्ट बंदर और भालू थे । इस प्रकार हनुमानजी बंदर हैं लेकिन विशिष्ट बंदर हैं-


जय बजरंगबली गिरिधारी । विग्रह वानराकार पुरारी  ।।


 

।। हनुमानजी महाराज की जय ।।

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सुन्दरकाण्ड-२७-हनुमानजी की पूँछ में राक्षसों द्वारा आग लगाया जाना

  रावण ने कहा जब यह बानर बिना पूँछ के अपने स्वामी के पास जाएगा तब यह मूर्ख अपने स्वामी को लेकर यहाँ आएगा । जिनकी इसने बहुत बड़ाई किया हैं, मै...

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