हनुमानजी महाराज से रावण ने कहा था कि क्या तुमने अपने कानों से हमारे बारे में नहीं सुना है ? अर्थात रावण अपनी प्रभुता के बारे में पूछ रहा था कि क्या तुम्हें मेरी प्रभुता के बारे में पता नहीं है ?
हनुमानजी महाराज ने कहा कि हे रावण मैं
तुम्हारी प्रभुता जानता हूँ । तुम्हारी सहसबाहु से लड़ाई हुई थी । इस लड़ाई में रावण
की हार हुई थी । सहसबाहु ने रावण को ऐसे पकड़कर दबोच लिया था जैसे किसीने किसी छोटे
प्राणी को सहज ही दबोच लिया हो । हनुमानजी महाराज ने आगे कहा कि बालि से युद्ध
करके तुम्हें बहुत यश मिला था । रावण ने बालि से हारने के बाद संधि कर लिया था ।
हनुमानजी के ऐसे बचनों को सुनकर रावण ने हँसकर अनसुना कर दिया ।
हनुमानजी महाराज ने आगे
कहा कि मुझे भूँख लगी थी इसलिए मैंने फल खा लिया । हनुमानजी ने कहा कि बंदर के
सहज स्वभाव से मैंने वृक्षों को तोड़ा है । अर्थात मैंने जान-बूझ कर ऐसा नहीं किया
है यह तो बानरों का सहज स्वभाव है ।
रावण ने पूछा था कि तुमने
राक्षसों को क्यों मारा ? इसके जबाब में हनुमानजी ने कहा कि सबको देंह प्रिय होती
है । लेकिन मुझे मेरे स्वामी परम प्रिय है । और मेरे स्वामी रामजी अपना घर बनाकर
मेरी देंह-ह्रदय में रहते हैं । और दुष्ट राक्षस मुझे मार रहे थे-मेरी देंह पर
प्रहार कर रहे थे । इसलिए जिसने मुझको मारा मैंने उसे मार डाला । इसपर तुम्हारे
पुत्र ने मुझे बाँध लिया । लेकिन मुझे बाँधे जाने पर कोई लज्जा नहीं है । मैं तो
अपने स्वामी भगवान राम का कार्य पूरा करना चाहता हूँ ।
अर्थात भगवान के किसी भी कार्य के लिए लज्जा की
कोई बात नहीं होती । जो करना पड़े करना चाहिए यदि भगवान का कार्य
होता हो । इसीप्रकार भजन में भी लज्जा की कोई बात नहीं होती । जैसे भजन बने भजन
करना चाहिए । जो भगवान से जोड़े वह जुड़ने योग्य-करने योग्य होता है । जिसमें भगवान
की प्रसन्नता हो उसे करना ही चाहिए ।
।। जय श्रीसीताराम ।।
No comments:
Post a Comment