राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।
अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहिं श्रीरघुराई ।।

Wednesday, June 3, 2026

सुन्दरकाण्ड-२५- हनुमान जी का रावण को सम्पदा और प्रभुता के मूल स्रोत के बारे में बताना


हनुमानजी महाराज ने रावण से कहा कि हे रावण तुम भगवान श्रीराम जी के चरण कमलों को ह्रदय में धारण कर लो और लंका पर अचल राज्य करो । ऋषि पुलस्त्य का यश निर्मल (कलंक रहित) चन्द्रमा जैसा है । और तुम उनके यश रुपी चन्द्रमा में कलंक मत बनो । अर्थात तुमभी रामानुरागी बन जाओ ।

 

  हनुमानजी ने आगे कहा कि तुम मद और मोह को छोड़कर बिचार करके देखो कि राम नाम के बिना वाणी की शोभा नहीं होती है । अर्थात जब तक मद, मोह का त्याग नहीं किया जायेगा तब तक राम नाम की महिमा समझ में नहीं आएगी । और जिह्वा का सदुपयोग नहीं हो पायेगा ।

 

हनुमानजी ने कहा कि हे देवताओं के शत्रु रावण श्रेष्ठ स्त्री की शोभा सारे आभूषणों से युक्त होकर भी वस्त्रहीन होने पर नहीं होती है । अर्थात जिह्वा की शोभा भी बिना राम नाम रुपी वस्त्र धारण किये नहीं होती है ।

 

  रामविमुख होने से सम्पदा और प्रभुता धीरे-धीरे चली जाती है । और इनका होना अथवा पाना न होने अथवा न पाने के समान हो जाता है । जिन नदियों में स्वयं का जल स्रोत नहीं होता वे बरसात समाप्त होने के बाद धीरे-धीरे सूख जाती हैं । बरसात के पानी से वे कितने दिन तक जलयुक्त बनी रह पाएँगी । ठीक इसी प्रकार जिनके पास सम्पदा और प्रभुता का मूल स्रोत नहीं होता उसकी सम्पदा और प्रभुता भी बरसाती पानी की तरह थोड़े दिन तक ही ठहरती है ।

 

  सम्पदा और प्रभुता का मूल स्रोत तो  भगवान श्रीरामजी की कृपा है । और बिना स्रोत के ऊपरी सम्पदा और प्रभुता कितने दिन ठहरेगी । इसलिए ही हनुमानजी रावण को समझाते हैं कि तुम रामजी के चरणकमलों को ह्रदय में धारण कर लो बस तुम्हें लंका का अचल राज्य मिल जाएगा । और तुम्हारी सम्पदा और प्रभुता स्थाई हो जायेगी । अन्यथा यदि तुम राम बिमुख बने रहोगे तो एक दिन तुम सम्पदा और प्रभुता दोनों से हीन हो जाओगे ।

 

  इसप्रकार सम्पदा, प्रभुता हो अथवा अन्य सुख हों सबका स्रोत रामजी की कृपा ही है । जिसे रामजी की कृपा मिल जाय उसे फिर सबकुछ मिल जाता है ।

 

।। जय श्रीसीताराम ।।

 

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