जब हनुमानजी ने देखा कि पूँछ में आग लगा दी गई है तो वे तुरंत बहुत ही सूक्ष्म रूप धारण कर लिए । और राक्षसों के बंधन से निकलकर सोने की अटारियों पर चढ़ गए जिससे राक्षस स्त्रियाँ बहुत ही डर गईं ।
भगवान राम की प्रेरणा से उस समय उनचास तरह की
वायु बहने लगी । हनुमानजी ने अट्टहास करके गर्जना किया और वे बढ़कर आकाश को छूने
लगे ।
हनुमान जी का शरीर बहुत ही विशाल था । लेकिन
शरीर का भार बहुत कम था । उनका शरीर बहुत हल्का था । और वे एक घर से दूसरे घर
दौड़कर चढ़ने लगे । लंका नगरी जलने लगी । लोग बेहाल हो गए । आग की अनेकों भयंकर
लपटें झपट रहीं थी ।
हा बाप, हा मैया की पुकार सुनाई पड़ रही है ।
लोग कहते हैं कि इस अवसर पर हम लोगों की रक्षा कौन करेगा ? कुछ लोग कहने लगे कि
हमने तो पहले ही कहा था कि यह बानर नहीं है । कोई देवता बानर पर धारण करके आ गया
है ।
लंका ऐसे जल रही थी मानों वह अनाथ की नगरी हो ।
अर्थात रावण जैसे प्रतापी राजा का भी कोई बश नहीं चल रहा था । यह साधु के अपमान का
फल था । राक्षसों ने हनुमानजी का बहुत अपमान किया था । वे उनपर पद-प्रहार कर रहे
थे । एक विभीषण के घर को छोड़कर हनुमानजी ने सारे नगर को एक क्षण में जला दिया ।
शंकरजी कहते हैं कि हनुमानजी उन प्रभु श्रीराम
के दूत हैं जिन्होंने अग्नि का निर्माण किया है । ऐसे में अग्नि हनुमानजी को कैसे
जला सकता था ? इसलिए हे उमा हनुमानजी नहीं जले । हनुमानजी ने उलट-पलटकर सारी लंका
को जला डाला और समुन्द्र के मजधार में कूद पड़े ।
समुंद्र में अपनी पूँछ
बुझा करके और आराम करके हनुमानजी ने फिर से छोटा सा रूप धारण कर लिया और जनकसुता माता सीता के सामने हाथ जोड़कर जा
खड़े हुए ।
।। लंका दहन करने वाले हनुमानजी महाराज की जय ।।
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