सीताजी ने हनुमानजी को निशानी के रूप में चूड़ामणि दिया
था और हनुमानजी जो रामजी की मुँदरी लाए थे उसे भी वापस कर दिया था । हनुमानजी राम जी से
मिलने और सीतामाता का समाचार सुनाने के लिए वापस जा रहे थे । व्रह्माजी ने प्रगट
होकर हनुमानजी को एक पत्र दिया जिसमें वो सब लिख दिया था जो-जो चरित हनुमानजी ने लंका
में किया था ।
हनुमानजी पत्र, चूड़ामणि और मुँदरी लेकर प्रसन्नतापूर्वक आकाशमार्ग से जा
रहे थे । वे शतयोजन सागर को पार कर लिए । हनुमानजी ने बहुत ही दुष्कर कार्य किया
था । जो और किसी के लिए संभव नहीं था । लंका जैसे दुर्गम दुर्ग में जाकर जो रावण, मेघनाद आदि जैसे योद्धाओं से पालित थी,
सीता माता का समाचार ले आए थे । अनेक योद्धाओं को युद्ध में अकेले ही मार दिया था ।
और रावण की अशोक वाटिका को उजाड़ दिया था तथा लंका को जला दिया था ।
हनुमानजी को थोड़ा मान हो गया था । इस पार आते ही
हनुमानजी ने देखा एक मुनि हैं और उनके पास कई बंदर भी हैं । हनुमानजी ने कहा
मुनिराज मैंने राम जी का दुष्कर कार्य सम्पन्न कर लिया है और अब मैं जलपान करना
चाहता हूँ । कृपया मुझे कोई सरोवर बताएँ । मुनि ने इशारे से सरोवर बता दिया ।
हनुमानजी पत्र, चूड़ामणि और मुँदरी मुनि के पास
रखकर जल पीने चले गए । इधर एक बंदर ने मुँदरी उठाकर मुनि के कमण्डल में डाल दिया ।
हनुमानजी ने वापस आकर देखा की मुँदरी वहाँ है ही नहीं । हनुमानजी ने मुँदरी के
बारे में मुनि से पूछा तो मुनि ने कमंडल की ओर इशारा कर दिया ।
हनुमानजी महाराज ने कमंडल में देखा तो उसमें राम
नाम अंकित अनेक मुँदरी दिखाई पड़ी । हनुमानजी ने पूछा मुनिराज इसमें मेरे द्वारा
लाई गई मुँदरी कौन सी है ।
मुनि ने कहा जब–जब हनुमान लंका जलाकर और सीताजी
का समाचार लेकर आते हैं और सरोवर में जल पीने के लिए जाते हैं तब-तब एक बंदर
मुँदरी मेरे कमंडल में डाल देता है । आप पहचान लो ।
मुँदरी
को पहचान पाना संभव नहीं था । सब एक जैसी थीं । सब पर राम नाम अंकित था । तो
हनुमानजी ने पूछा मुनिराज अब तक कितने हनुमान आए हैं जिन्होंने ये दुष्कर कार्य
पूर्व में सम्पन्न किया था ।
मुनि ने कहा आप गिनकर देख लो । हनुमानजी अंजली
भर-भरकर मुँदरी निकालने लगे । लेकिन मुँदरी का कोई अंत ही नहीं था । इसलिए
हनुमानजी ने जो मुँदरी निकाली थी उसे भी कमंडल में डाल दिया । और मुनि को प्रमाण
करके पत्र और चूड़ामणि लेकर अपने साथियों-अंगद, जामवंत आदि से मिलने चल दिए ।
हनुमानजी मन में यही सोचते जा रहे थे कि मुझसे
पहले भी कई हनुमान ने ये रामकाज सम्पन्न किया है । मैं पहला नहीं हूँ जिसने ऐसा
किया है । उन्हें मुँदरी खो जाने का दुख भी था ।
।। जय श्रीराम ।।
।। जय श्रीहनुमान ।।
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