राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।
अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहिं श्रीरघुराई ।।

Saturday, November 7, 2026

सुन्दरकाण्ड-३०- राम नाम अंकित रामजी की मुँदरी का गायब होना

सीताजी ने हनुमानजी को निशानी के रूप में चूड़ामणि दिया था और हनुमानजी जो रामजी की मुँदरी लाए थे उसे भी वापस कर दिया था । हनुमानजी राम जी से मिलने और सीतामाता का समाचार सुनाने के लिए वापस जा रहे थे । व्रह्माजी ने प्रगट होकर हनुमानजी को एक पत्र दिया जिसमें वो सब लिख दिया था जो-जो चरित हनुमानजी ने लंका में किया था ।

 

  हनुमानजी पत्र, चूड़ामणि और मुँदरी लेकर प्रसन्नतापूर्वक आकाशमार्ग से जा रहे थे । वे शतयोजन सागर को पार कर लिए । हनुमानजी ने बहुत ही दुष्कर कार्य किया था । जो और किसी के लिए संभव नहीं था । लंका जैसे दुर्गम दुर्ग में जाकर जो  रावण, मेघनाद आदि जैसे योद्धाओं से पालित थी, सीता माता का समाचार ले आए थे । अनेक योद्धाओं को युद्ध में अकेले ही मार दिया था । और रावण की अशोक वाटिका को उजाड़ दिया था तथा लंका को जला दिया था ।

 

हनुमानजी को थोड़ा मान हो गया था । इस पार आते ही हनुमानजी ने देखा एक मुनि हैं और उनके पास कई बंदर भी हैं । हनुमानजी ने कहा मुनिराज मैंने राम जी का दुष्कर कार्य सम्पन्न कर लिया है और अब मैं जलपान करना चाहता हूँ । कृपया मुझे कोई सरोवर बताएँ । मुनि ने इशारे से सरोवर बता दिया ।

 

हनुमानजी पत्र, चूड़ामणि और मुँदरी मुनि के पास रखकर जल पीने चले गए । इधर एक बंदर ने मुँदरी उठाकर मुनि के कमण्डल में डाल दिया । हनुमानजी ने वापस आकर देखा की मुँदरी वहाँ है ही नहीं । हनुमानजी ने मुँदरी के बारे में मुनि से पूछा तो मुनि ने कमंडल की ओर इशारा कर दिया ।

 

 हनुमानजी महाराज ने कमंडल में देखा तो उसमें राम नाम अंकित अनेक मुँदरी दिखाई पड़ी । हनुमानजी ने पूछा मुनिराज इसमें मेरे द्वारा लाई गई मुँदरी कौन सी है ।

मुनि ने कहा जब–जब हनुमान लंका जलाकर और सीताजी का समाचार लेकर आते हैं और सरोवर में जल पीने के लिए जाते हैं तब-तब एक बंदर मुँदरी मेरे कमंडल में डाल देता है । आप पहचान लो ।

 

  मुँदरी को पहचान पाना संभव नहीं था । सब एक जैसी थीं । सब पर राम नाम अंकित था । तो हनुमानजी ने पूछा मुनिराज अब तक कितने हनुमान आए हैं जिन्होंने ये दुष्कर कार्य पूर्व में सम्पन्न किया था ।

 

मुनि ने कहा आप गिनकर देख लो । हनुमानजी अंजली भर-भरकर मुँदरी निकालने लगे । लेकिन मुँदरी का कोई अंत ही नहीं था । इसलिए हनुमानजी ने जो मुँदरी निकाली थी उसे भी कमंडल में डाल दिया । और मुनि को प्रमाण करके पत्र और चूड़ामणि लेकर अपने साथियों-अंगद, जामवंत आदि से मिलने चल दिए ।

 

 हनुमानजी मन में यही सोचते जा रहे थे कि मुझसे पहले भी कई हनुमान ने ये रामकाज सम्पन्न किया है । मैं पहला नहीं हूँ जिसने ऐसा किया है । उन्हें मुँदरी खो जाने का दुख भी था ।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय श्रीहनुमान ।।

  

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