हनुमानजी महाराज ने माता सीता से कहा कि हे माता जिस तरह रघुनायक भगवान श्रीराम ने मुझे पहचान के लिए अगूंठी दिया था । वैसे ही आप भी मुझे पहचान के लिए कोई चिंह दीजिए । माता सीता ने हनुमानजी को अपनी चूड़ामणि उतार कर दिया जिसे हनुमानजी ने हर्षित होकर ले लिया ।
सीताजी ने हनुमानजी से कहा कि हे तात मेरा प्रणाम निवेदित करके ऐसा कहना कि हे प्रभु रामचन्द्रजी आप तो हर तरह से पूरणकाम हैं । अर्थात आपकी अपनी कोई कामना नहीं है । परंतु आप दीनों-भक्तों की सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले हो । हे दीनों पर दया करने वाले रामजी, हे नाथ आप अपने विरद को याद करके मुझ पर आए हुए बड़े संकट का हरण कर लीजिए ।
हे तात आप रामजी को इंद्रपुत्र जयंत की कथा सुनाना और राम जी के वाण का प्रताप प्रभु राम को समझाना । अर्थात कहना कि हे प्रभु जयंत ने जब माता सीता को चोंच मारकर अपराध किया था तो आपने उस पर बिना देर किए ही वाण चला दिया था । और रावण ने तो माता सीता का हरण करके आप से दूर कर दिया है । रावण का अपराध बड़ा है । फिर भी आप ढ़ील क्यों दिए हो । देरी क्यों कर रहे हो । मैं दीन हूँ । और दुष्ट यहाँ मुझे परेशान कर रहे हैं । आप दीनों पर दया करने वाले हैं । मुझ दीन पर भी दया करके मेरे कष्टों का अंत कर दीजिए ।
प्रभुजी आपके वाण की बड़ी महिमा है । आपने तो जयंत के ऊपर सींक के धनुष पर सींक का सर संधान करके छोड़ दिया था । जो उसका तीनों लोकों में पीछा करता रहा । देवराज इंद्र, भगवान शिव, जगतपिता व्रह्माजी आदि भी उसको ठौर नहीं दे सके । अंत में जब वह आपकी शरण में आया तो उसकी एक आँख फोड़कर आपने उसे जीवनदान दे दिया । आप इतने समर्थ हैं कि वहीं से सर संधान करके रावण और उसकी सेना का अंत कर सकते हैं फिर भी मेरे लिए देर क्यों कर रहे हैं ।
सीताजी ने आगे कहा कि यदि एक महीने के भीतर रामजी ने मेरी सुधि नहीं लिया, यहाँ नहीं आए तो मुझे जीवित नहीं पाएँगे । हे हनुमान मैं अपने प्राणों को किस प्रकार धारण करूँ । अब तो तुम भी जाने के लिए कह रहे हो । तुम्हें देखकर ह्रदय में शीतलता आई थी । लेकिन अब तुम्हारे जाने के बाद मेरे लिए फिर से वही रात और दिन होंगे । अर्थात तुमसे मिलकर और प्रभु का संदेश पाकर मैं हर्षित थी लेकिन अब फिर से वही दुःख भरे दिन और रात आ जायेंगे यानी दुष्ट जन सतायेंगे और प्रभु से दूरी कष्ट देगी ।
हनुमानजी जी ने माता जानकी को समझा-बुझाकर अनेक तरह से धीरज धारण कराया । और सीताजी के चरणों में प्रणाम करके भगवान श्रीराम के पास प्रस्थान किया ।
।। जय श्रीसीताराम ।।
।। जय श्रीहनुमानजी ।।