राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।
अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहिं श्रीरघुराई ।।

Saturday, February 21, 2026

सुन्दरकाण्ड-२१- हनुमानजी का मेघनाद से युद्ध और बंदी बनकर रावण की सभा में प्रवेश

 अपने पुत्र का वध सुनकर रावण क्रोधित हो उठा । और उसने बलवान मेघनाद को भेजा । रावण ने कहा कि हे पुत्र उसे मारना नहीं । बाँध लाना । देखा जाय वह बंदर कहाँ से आया है  । अर्थात उसके बारे में जाना जाय कि वह कहाँ का है । और क्यों आया है । या उसे किसी ने भेजा है । इंद्र को युद्ध में जीतने वाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला और उसे भाई का वध सुनकर क्रोध हो आया ।

 

  हनुमानजी महाराज ने देखा कि इस बार भयानक योद्धा आया है । तो वे कटकटाकर गर्जे और दौड़े । हनुमान जी ने एक बहुत ही विशाल वृक्ष को उखाड़ लिया । और उसे मेघनाद के रथ पर फेका । मेघनाद का रथ टूट गया । इस प्रकार मेघनाद रथ से बिहीन हो गया । मेघनाद के साथ बड़े-बड़े योद्धा थे । हनुमानजी उन्हें पकड़-पकड़कर अपने शरीर से ही रगड़ना शुरू कर दिया । योद्धाओं को मारकर हनुमानजी मेघनाद से लड़ने लगे । ऐसा लग रहा था कि कोई दो गजराज लड़ रहे हों ।

 

  हनुमानजी ने मेघनाद के ऊपर मुष्टिक का प्रहार करके पेड़ पर चढ़ गए और उसे एक क्षण के लिए मूर्छा आ गई । मूर्छा दूर होने पर मेघनाद ने फिर से बहुत सारी माया दिखाई । लेकिन पवनसुत हनुमानजी उससे जीते नहीं जा रहे थे । अर्थात वह असफल ही हो रहा था । तब उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया । हनुमानजी ने बिचार किया कि इस अस्त्र की अपार महिमा है । यदि मैं इसके वार को नहीं सहूँगा तो इस अस्त्र का निरादर हो जायेगा । इसकी महिमा मिट जायेगी । यह सोचकर हनुमानजी ने उसका वार सह लिया । ब्रह्मास्त्र के लगने पर हनुमानजी मूर्छित होकर गिर गए । और गिरते हुए भी उन्होंने मेघनाद की सेना का संहार किया ।

 

  मेघनाद ने देखा कि हनुमानजी मूर्छित हो गए हैं तब उसने नागपाश से हनुमानजी को बाँधकरले गया ।

  शंकरजी पार्वती माता से कहते हैं कि हे भवानी जिनका नाम जप करके ज्ञानी लोग जन संसार रुपी बंधन को काट कर मुक्त हो जाते हैं । ऐसे भगवान राम के दूत हनुमानजी कहीं बंधन में आ सकते हैं क्या ? अर्थात हनुमानजी को कोई बाँध नहीं सकता । हनुमानजी ने रामजी का कार्य पूरा करने के लिए स्वयं को जान बूझकर बँधा लिया है ।

 

जब राक्षसों ने सुना कि जो बंदर अशोक वाटिका में फल खा रहा था बंदी बना लिया गया है तब वे लोग तमाशा देखने के लिए रावण की सभा में आ गए । हनुमानजी ने रावण की सभा को जाकर देखा । उसकी इतनी प्रभुता थी जिसका कोई वर्णन नहीं हो सकता ।  देवता और दिग्पाल हाथ जोड़कर बहुत ही विनीत भाव से खड़े हुए थे । सभी लोग डरे हुए रावण की भृकुटी की तरफ देख रहे थे । अर्थात कब किसकी ओर रावण भृकुटी टेढ़ी कर दे कोई पता नहीं था । इस प्रकार सब डरे हुए रावण का रुख देख रहे थे ।

 

   रावण का इतना प्रताप देखकर भी हनुमानजी के मन में कोई शंका नहीं हुई । अर्थात कोई भय नहीं हुआ । वे उसकी सभा में इस प्रकार पहुँचे और इस प्रकार खड़े हुए थे जैसे सांपों के झुण्ड में गरुड़जी निडर रहते हैं । अर्थात जिस प्रकार गरुड़ जी को देखकर सांपों को भय होता है । सांप डर जाते हैं । उसी प्रकार हनुमानजी को देखकर उल्टे राक्षसों को भय हुआ । 

                       

।। जय श्रीसीताराम ।।

Saturday, February 14, 2026

जय जय जय श्रीराम रँगीले

।। श्रीहनुमते नमः ।।

 

जय जय जय श्रीराम रँगीले ।

अंजनासुवन केसरीनंदन श्रीहनुमान हठीले ।।१।।

 

तन मन रँगा राम रंग जाको गुनगन चरित रसीले ।

तीनकाल तिहुँलोक में ऐसा, और नहीं कोउ मीले ।।२।।

 

जाके उर आगार बसत प्रभु, रघुवर राम सजीले ।

पुलक रोमांच सुने गुनगन प्रभु, प्रेम वारि दृग गीले ।।३।।

 

रामदूत जन दीन सँभारत, नाम सुनत खल हीले ।

राम भगत समरथ सुखदायक, कौन बाँह बल तोले ।।४।।

 

राम भगति नव तरु उर रोपत, काटत कठिन करीले ।

दीन संतोष बाँह मोरी गहिए दीनन बाँहगहीले ।।५।।

 


।। जय श्रीहनुमानजी ।।

 

Tuesday, February 10, 2026

सुन्दरकाण्ड-२०-सीताजी से आज्ञा लेकर हनुमानजी का वाटिका में प्रवेश और राक्षसों से युद्ध तथा अक्ष कुमार का वध

 सीताजी से आशिर्बाद पाकर हनुमानजी महाराज ने सीताजी से कहा कि हे माता ! सुनिए- मुझे सुंदर फल से युक्त वृक्षों को देखकर बड़ी भूँख लग गई है । जैसे छोटे बच्चे को खाने-पीने वाली चीज देखकर भूँख लग जाती है और वह अपनी माता से माँगने लग जाता है । ठीक इसी भाव से हनुमान जी को सुंदर-सुंदर फल देखकर भूँख लग गई और उन्होंने माता सीता से निवेदन भी कर दिया ।

 

  माता सीता ने कहा कि हे बेटा ! सुनो इस वन की रखवाली बड़े-बड़े भारी योद्धा राक्षस करते हैं । अर्थात रावण ने इस वाटिका की रक्षा के लिए बड़े-बड़े योद्धाओं को लगा रखा है । हनुमान जी ने कहा के माता यदि आप मन में प्रसन्न होकर आज्ञा दें तो मुझे योद्धाओं का भय नहीं है ।

 

सीता जी ने देखा कि हनुमान जी बल और बुद्धि में निपुण हैं इसलिए कहा कि जाओ और रामजी के चरणों को हृदय में धरकर मधुर फल खाओ । अर्थात राम जी को भोग लगाकर, राम जी को निवेदित करके मधुर-मधुर फल खाइए । 

 

हनुमानजी ने माता सीता के चरणों में शिर नवाकर अर्थात प्रणाम करके वाटिका में प्रवेश किया । और फल खाकर पेड़ों को तोड़ने लगे । वाटिका की रखवारी में बहुत से योद्धा थे । कुछ योद्धाओं को हनुमानजी ने मार दिया और कुछ रावण के पास जाकर पुकारने लगे ।

 

राक्षस योद्धा रावण से बोले कि हे स्वामी ! एक बहुत बड़ा वानर आया है जिसने अशोक वाटिका को उजाड़ दिया है । उसने फल खाएँ हैं और वृक्षों को उखाड़ दिया है । तथा रक्षकों को मसल-मसलकर पृथ्वी पर गिरा दिया है । ऐसा सुनकर रावण ने बहुत सारे योद्धाओं को भेजा । जिन्हें देखकर हनुमानजी महाराज ने गर्जना की । हनुमान जी ने सभी राक्षसों का संहार कर दिया । कुछ अधमरे राक्षस चिल्लाते हुए रावण के पास गए ।

 

फिर रावण ने अपने बेटे अच्छकुमार को भेजा । वह अपने साथ अनेकों श्रेष्ठ योद्धाओं को लेकर चला । उसे आता हुआ देखकर हनुमान जी ने एक वृक्ष को पकड़कर-हाथ में लेकर उसे ललकारा और उसे सहज ही मारकर बड़े जोर से गर्जना की ।

 

अक्ष कुमार के साथ जो योद्धा आए थे उनमें से कुछ को मार डाला, कुछ को मसल डाला और कुछ को पकड़कर धूल में मिला दिया-गाड़ दिया । और कुछ फिर जाकर रावण से बोले कि हे स्वामी वह मर्कट बड़ा ही बलवान है । 

 

                                                      

।। जय श्रीसीताराम ।।

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सुंदरकाण्ड भाग-२२- हनुमानजी का रावण के प्रश्नों का उत्तर देना- राम जी की महिमा का वर्णन

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