राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।
अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहिं श्रीरघुराई ।।

Thursday, April 2, 2026

सुन्दरकाण्ड-23 -हनुमान जी का रावण के अन्य प्रश्नों का उत्तर देना

 हनुमानजी महाराज से रावण ने कहा था कि क्या तुमने अपने कानों से हमारे बारे में नहीं सुना  है ? अर्थात रावण अपनी प्रभुता के बारे में पूछ रहा था कि क्या तुम्हें मेरी प्रभुता के बारे में  पता नहीं है ?

  हनुमानजी महाराज ने कहा कि हे रावण मैं तुम्हारी प्रभुता जानता हूँ । तुम्हारी सहसबाहु से लड़ाई हुई थी । इस लड़ाई में रावण की हार हुई थी । सहसबाहु ने रावण को ऐसे पकड़कर दबोच लिया था जैसे किसीने किसी छोटे प्राणी को सहज ही दबोच लिया हो । हनुमानजी महाराज ने आगे कहा कि बालि से युद्ध करके तुम्हें बहुत यश मिला था । रावण ने बालि से हारने के बाद संधि कर लिया था । हनुमानजी के ऐसे बचनों को सुनकर रावण ने हँसकर अनसुना कर दिया ।

 

हनुमानजी महाराज ने आगे कहा कि मुझे भूँख लगी थी इसलिए मैंने फल खा लिया । हनुमानजी ने कहा कि बंदर के सहज स्वभाव से मैंने वृक्षों को तोड़ा है । अर्थात मैंने जान-बूझ कर ऐसा नहीं किया है यह तो बानरों का सहज स्वभाव है ।

 

रावण ने पूछा था कि तुमने राक्षसों को क्यों मारा ? इसके जबाब में हनुमानजी ने कहा कि सबको देंह प्रिय होती है । लेकिन मुझे मेरे स्वामी परम प्रिय है । और मेरे स्वामी रामजी अपना घर बनाकर मेरी देंह-ह्रदय में रहते हैं । और दुष्ट राक्षस मुझे मार रहे थे-मेरी देंह पर प्रहार कर रहे थे । इसलिए जिसने मुझको मारा मैंने उसे मार डाला । इसपर तुम्हारे पुत्र ने मुझे बाँध लिया । लेकिन मुझे बाँधे जाने पर कोई लज्जा नहीं है । मैं तो अपने स्वामी भगवान राम का कार्य पूरा करना चाहता हूँ ।

  अर्थात भगवान के किसी भी कार्य के लिए लज्जा की कोई बात नहीं होती । जो करना पड़े करना चाहिए यदि  भगवान का कार्य होता हो । इसीप्रकार भजन में भी लज्जा की कोई बात नहीं होती । जैसे भजन बने भजन करना चाहिए । जो भगवान से जोड़े वह जुड़ने योग्य-करने योग्य होता है । जिसमें भगवान की प्रसन्नता हो उसे करना ही चाहिए ।

 

                                              

।। जय श्रीसीताराम ।।

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